शुक्रवार, २९ सप्टेंबर, २०१७

Deshbhakti slogans

Desh Bhakti Slogans
बड़ा ही गहरा दाग़ है यारों जिसका ग़ुलामी

बड़ा ही गहरा दाग़ है यारों जिसका ग़ुलामी नाम है, उसका जीना भी क्या जीना जिसका देश ग़ुलाम है!
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धरती हरी भरी हो आकाश मुस्कुराए
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धरती हरी भरी हो आकाश मुस्कुराए, कुछ कर दिखाओ ऐसा इतिहास जगमगाए।
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हर तूफान को मोड़ दे जो हिन्दोस्तान से टकराए
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हर तूफान को मोड़ दे जो हिन्दोस्तान से टकराए, चाहे तेरा सीना हो छलनी तिरंगा उंचा ही लहराए |
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इतना ही कहेना काफी नही भारत हमारा मान है
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इतना ही कहेना काफी नही भारत हमारा मान है, अपना फ़र्ज़ निभाओ देश कहे हम उसकी शान है |
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पहले हम खुद को पहचाने फिर पहचानें अपना देश
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पहले हम खुद को पहचाने फिर पहचानें अपना देश, एक दमकता सत्य बनेगा, नहीं रहेगा सपना देश.
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दोनों ही करते है कुर्बान माँ ममता को जान को जवान
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दोनों ही करते है कुर्बान, माँ ममता को, जान को जवान इसीलिए तो है मेरा भारत महान.
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किसकी राह देख रहा तुम खुद सिपाही बन जाना
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किसकी राह देख रहा, तुम खुद सिपाही बन जाना, सरहद पर ना सही , सीखो आंधियारो से लढ पाना |
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विकसित होता राष्ट्र हमारा रंग लाती हर कुर्बानी है
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विकसित होता राष्ट्र हमारा, रंग लाती हर कुर्बानी है, फक्र से अपना परिचय देते,हम सारे हिन्दोस्तानी है|
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वीर चले है देखो लड़ने दुश्मन से सरहद पर भिड़ने
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वीर चले है देखो लड़ने, दुश्मन से सरहद पर भिड़ने.
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कुछ कर गुजरने की गर तमन्ना उठती हो दिल में
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कुछ कर गुजरने की गर तमन्ना उठती हो दिल में, भारत मा का नाम सजाओ दुनिया की महफिल में |
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बंद करो ये तुम आपस में खेलना अब खून की होली
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बंद करो ये तुम आपस में खेलना अब खून की होली, उस मा को याद करो जिसने खून से चुन्नर भिगोली |

Deshbhakti slogans

गुरुवार, २८ सप्टेंबर, २०१७

अनमोल वचन2

अनमोल वचन


    अपना मूल्य समझो और विश्वास करो कि तुम संसार के सबसे महत्त्वपूर्ण व्यक्ति हो।
    अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।
    अपना काम दूसरों पर छोड़ना भी एक तरह से दूसरे दिन काम टालने के समान ही है। ऐसे व्यक्ति का अवसर भी निकल जाता है और उसका काम भी पूरा नहीं हीता।
    अपना आदर्श उपस्थित करके ही दूसरों को सच्ची शिक्षा दी जा सकती है।
    अपने व्यवहार में पारदर्शिता लाएँ। अगर आप में कुछ कमियाँ भी हैं, तो उन्हें छिपाएं नहीं; क्योंकि कोई भी पूर्ण नहीं है, सिवाय एक ईश्वर के।
    अपने हित की अपेक्षा जब परहित को अधिक महत्त्व मिलेगा तभी सच्चा सतयुग प्रकट होगा।
    अपने दोषों से सावधान रहो; क्योंकि यही ऐसे दुश्मन है, जो छिपकर वार करते हैं।
    अपने अज्ञान को दूर करके मन-मन्दिर में ज्ञान का दीपक जलाना भगवान की सच्ची पूजा है।
    अपने दोषों की ओर से अनभिज्ञ रहने से बढ़कर प्रमाद इस संसार में और कोई दूसरा नहीं हो सकता।
    अपने कार्यों में व्यवस्था, नियमितता, सुन्दरता, मनोयोग तथा ज़िम्मेदार का ध्यान रखें।
    अपने जीवन में सत्प्रवृत्तियों को प्रोतसाहन एवं प्रश्रय देने का नाम ही विवेक है। जो इस स्थिति को पा लेते हैं, उन्हीं का मानव जीवन सफल कहा जा सकता है।
    अपने आपको सुधार लेने पर संसार की हर बुराई सुधर सकती है।
    अपने आपको जान लेने पर मनुष्य सब कुछ पा सकता है।
    अपने दोषों की ओर से अनभिज्ञ रहने से बड़ा प्रमाद इस संसार में और कोई दूसरा नहीं हो सकता।
    अपने आप को बचाने के लिये तर्क-वितर्क करना हर व्यक्ति की आदत है, जैसे क्रोधी व लोभी आदमी भी अपने बचाव में कहता मिलेगा कि, यह सब मैंने तुम्हारे कारण किया है।
    अपने देश का यह दुर्भाग्य है कि आज़ादी के बाद देश और समाज के लिए नि:स्वार्थ भाव से खपने वाले सृजेताओं की कमी रही है।
    अपने गुण, कर्म, स्वभाव का शोधन और जीवन विकास के उच्च गुणों का अभ्यास करना ही साधना है।
    अपने को मनुष्य बनाने का प्रयत्न करो, यदि उसमें सफल हो गये, तो हर काम में सफलता मिलेगी।
    अपने आप को अधिक समझने व मानने से स्वयं अपना रास्ता बनाने वाली बात है।
    अपनी कलम सेवा के काम में लगाओ, न कि प्रतिष्ठा व पैसे के लिये। कलम से ही ज्ञान, साहस और त्याग की भावना प्राप्त करें।
    अपनी स्वंय की आत्मा के उत्थान से लेकर, व्यक्ति विशेष या सार्वजनिक लोकहितार्थ में निष्ठापूर्वक निष्काम भाव आसक्ति को त्याग कर समत्व भाव से किया गया प्रत्येक कर्म यज्ञ है।
    अपनी आन्तरिक क्षमताओं का पूरा उपयोग करें तो हम पुरुष से महापुरुष, युगपुरुष, मानव से महामानव बन सकते हैं।
    अपनी दिनचर्या में परमार्थ को स्थान दिये बिना आत्मा का निर्मल और निष्कलंक रहना संभव नहीं।
    अपनी प्रशंसा आप न करें, यह कार्य आपके सत्कर्म स्वयं करा लेंगे।
    अपनी विकृत आकांक्षाओं से बढ़कर अकल्याणकारी साथी दुनिया में और कोई दूसरा नहीं।
    अपनी महान् संभावनाओं पर अटूट विश्वास ही सच्ची आस्तिकता है।
    अपनी भूलों को स्वीकारना उस झाडू के समान है जो गंदगी को साफ़ कर उस स्थान को पहले से अधिक स्वच्छ कर देती है।
    अपनी शक्तियो पर भरोसा करने वाला कभी असफल नहीं होता।
    अपनी बुद्धि का अभिमान ही शास्त्रों की, सन्तों की बातों को अन्त: करण में टिकने नहीं देता।
    अपनों के लिये गोली सह सकते हैं, लेकिन बोली नहीं सह सकते। गोली का घाव भर जाता है, पर बोली का नहीं।
    अपनों व अपने प्रिय से धोखा हो या बीमारी से उठे हों या राजनीति में हार गए हों या श्मशान घर में जाओ; तब जो मन होता है, वैसा मन अगर हमेशा रहे, तो मनुष्य का कल्याण हो जाए।
    अपनों के चले जाने का दुःख असहनीय होता है, जिसे भुला देना इतना आसान नहीं है; लेकिन ऐसे भी मत खो जाओ कि खुद का भी होश ना रहे।
    अगर किसी को अपना मित्र बनाना चाहते हो, तो उसके दोषों, गुणों और विचारों को अच्छी तरह परख लेना चाहिए।
    अगर हर आदमी अपना-अपना सुधार कर ले तो, सारा संसार सुधर सकता है; क्योंकि एक-एक के जोड़ से ही संसार बनता है।
    अगर कुछ करना व बनाना चाहते हो तो सर्वप्रथम लक्ष्य को निर्धारित करें। वरना जीवन में उचित उपलब्धि नहीं कर पायेंगे।
    अगर आपके पास जेब में सिर्फ दो पैसे हों तो एक पैसे से रोटी ख़रीदें तथा दूसरे से गुलाब की एक कली।
    अतीत की स्म्रतियाँ और भविष्य की कल्पनाएँ मनुष्य को वर्तमान जीवन का सही आनंद नहीं लेने देतीं। वर्तमान में सही जीने के लिये आवश्य है अनुकूलता और प्रतिकूलता में सम रहना।
    अतीत को कभी विस्म्रत न करो, अतीत का बोध हमें ग़लतियों से बचाता है।
    अपराध करने के बाद डर पैदा होता है और यही उसका दण्ड है।
    अभागा वह है, जो कृतज्ञता को भूल जाता है।
    अखण्ड ज्योति ही प्रभु का प्रसाद है, वह मिल जाए तो जीवन में चार चाँद लग जाएँ।
    अडिग रूप से चरित्रवान बनें, ताकि लोग आप पर हर परिस्थिति में विश्वास कर सकें।
    अच्छा व ईमानदार जीवन बिताओ और अपने चरित्र को अपनी मंज़िल मानो।
    अच्छा साहित्य जीवन के प्रति आस्था ही उत्पन्न नहीं करता, वरन उसके सौंदर्य पक्ष का भी उदघाटन कर उसे पूजनीय बना देता है।
    अधिक सांसारिक ज्ञान अर्जित करने से अंहकार आ सकता है, परन्तु आध्यात्मिक ज्ञान जितना अधिक अर्जित करते हैं, उतनी ही नम्रता आती है।
    अधिक इच्छाएँ प्रसन्नता की सबसे बड़ी शत्रु हैं।
    अपनापन ही प्यारा लगता है। यह आत्मीयता जिस पदार्थ अथवा प्राणी के साथ जुड़ जाती है, वह आत्मीय, परम प्रिय लगने लगती है।
    अवसर की प्रतीक्षा में मत बैठो। आज का अवसर ही सर्वोत्तम है।
    अवसर उनकी सहायता कभी नहीं करता, जो अपनी सहायता नहीं करते।
    अवसर की प्रतीक्षा में मत बैठों। आज का अवसर ही सर्वोत्तम है।
    अवतार व्यक्ति के रूप में नहीं, आदर्शवादी प्रवाह के रूप में होते हैं और हर जीवन्त आत्मा को युगधर्म निबाहने के लिए बाधित करते हैं।
    अस्त-व्यस्त रीति से समय गँवाना अपने ही पैरों कुल्हाड़ी मारना है।
    अवांछनीय कमाई से बनाई हुई खुशहाली की अपेक्षा ईमानदारी के आधार पर गरीबों जैसा जीवन बनाये रहना कहीं अच्छा है।
    असत्य से धन कमाया जा सकता है, पर जीवन का आनन्द, पवित्रता और लक्ष्य नहीं प्राप्त किया जा सकता।
    अंध परम्पराएँ मनुष्य को अविवेकी बनाती हैं।
    अंध श्रद्धा का अर्थ है, बिना सोचे-समझे, आँख मूँदकर किसी पर भी विश्वास।
    असफलता केवल यह सिद्ध करती है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं हुआ।
    असफलता मुझे स्वीकार्य है किन्तु प्रयास न करना स्वीकार्य नहीं है।
    असफलताओं की कसौटी पर ही मनुष्य के धैर्य, साहस तथा लगनशील की परख होती है। जो इसी कसौटी पर खरा उतरता है, वही वास्तव में सच्चा पुरुषार्थी है।
    अस्वस्थ मन से उत्पन्न कार्य भी अस्वस्थ होंगे।
    असत्‌ से सत्‌ की ओर, अंधकार से आलोक की ओर तथा विनाश से विकास की ओर बढ़ने का नाम ही साधना है।
    अश्लील, अभद्र अथवा भोगप्रधान मनोरंजन पतनकारी होते हैं।
    अंतरंग बदलते ही बहिरंग के उलटने में देर नहीं लगती है।
    अनीति अपनाने से बढ़कर जीवन का तिरस्कार और कुछ हो ही नहीं सकता।
    अव्यवस्थित जीवन, जीवन का ऐसा दुरुपयोग है, जो दरिद्रता की वृद्धि कर देता है। काम को कल के लिए टालते रहना और आज का दिन आलस्य में बिताना एक बहुत बड़ी भूल है। आरामतलबी और निष्क्रियता से बढ़कर अनैतिक बात और दूसरी कोई नहीं हो सकती।
    अहंकार छोड़े बिना सच्चा प्रेम नहीं किया जा सकता।
    अहंकार के स्थान पर आत्मबल बढ़ाने में लगें, तो समझना चाहिए कि ज्ञान की उपलब्धि हो गयी।
    अन्याय में सहयोग देना, अन्याय के ही समान है।
    अल्प ज्ञान ख़तरनाक होता है।
    अहिंसा सर्वोत्तम धर्म है।
    अधिकार जताने से अधिकार सिद्ध नहीं होता।
    अपवित्र विचारों से एक व्यक्ति को चरित्रहीन बनाया जा सकता है, तो शुद्ध सात्विक एवं पवित्र विचारों से उसे संस्कारवान भी बनाया जा सकता है।
    असंयम की राह पर चलने से आनन्द की मंज़िल नहीं मिलती।
    अज्ञान और कुसंस्कारों से छूटना ही मुक्ति है।
    असत्‌ से सत्‌ की ओर, अंधकार से आलोक की और विनाश से विकास की ओर बढ़ने का नाम ही साधना है।
    'अखण्ड ज्योति' हमारी वाणी है। जो उसे पढ़ते हैं, वे ही हमारी प्रेरणाओं से परिचित होते हैं।
    अध्ययन, विचार, मनन, विश्वास एवं आचरण द्वार जब एक मार्ग को मज़बूति से पकड़ लिया जाता है, तो अभीष्ट उद्देश्य को प्राप्त करना बहुत सरल हो जाता है।
    अनासक्त जीवन ही शुद्ध और सच्चा जीवन है।
    अवकाश का समय व्यर्थ मत जाने दो।
    अन्धेरी रात के बाद चमकीला सुबह अवश्य ही आता है।
    अब भगवान गंगाजल, गुलाबजल और पंचामृत से स्नान करके संतुष्ट होने वाले नहीं हैं। उनकी माँग श्रम बिन्दुओं की है। भगवान का सच्चा भक्त वह माना जाएगा जो पसीने की बूँदों से उन्हें स्नान कराये।
    अज्ञानी वे हैं, जो कुमार्ग पर चलकर सुख की आशा करते हैं।
    अंत:करण मनुष्य का सबसे सच्चा मित्र, नि:स्वार्थ पथप्रदर्शक और वात्सल्यपूर्ण अभिभावक है। वह न कभी धोखा देता है, न साथ छोड़ता है और न उपेक्षा करता है।
    अंत:मन्थन उन्हें ख़ासतौर से बेचैन करता है, जिनमें मानवीय आस्थाएँ अभी भी अपने जीवंत होने का प्रमाण देतीं और कुछ सोचने करने के लिये नोंचती-कचौटती रहती हैं।
    अच्छाइयों का एक-एक तिनका चुन-चुनकर जीवन भवन का निर्माण होता है, पर बुराई का एक हलका झोंका ही उसे मिटा डालने के लिए पर्याप्त होता है।
    अच्छाई का अभिमान बुराई की जड़ है।
    अज्ञान, अंधकार, अनाचार और दुराग्रह के माहौल से निकलकर हमें समुद्र में खड़े स्तंभों की तरह एकाकी खड़े होना चाहिये। भीतर का ईमान, बाहर का भगवान इन दो को मज़बूती से पकड़ें और विवेक तथा औचित्य के दो पग बढ़ाते हुये लक्ष्य की ओर एकाकी आगे बढ़ें तो इसमें ही सच्चा शौर्य, पराक्रम है। भले ही लोग उपहास उड़ाएं या असहयोगी, विरोधी रुख़ बनाए रहें।
    अधिकांश मनुष्य अपनी शक्तियों का दशमांश ही का प्रयोग करते हैं, शेष 90 प्रतिशत तो सोती रहती हैं।
    अर्जुन की तरह आप अपना चित्त केवल लक्ष्य पर केन्द्रित करें, एकाग्रता ही आपको सफलता दिलायेगी।



    आवेश जीवन विकास के मार्ग का भयानक रोड़ा है, जिसको मनुष्य स्वयं ही अपने हाथ अटकाया करता है।
    आँखों से देखा’ एक बार अविश्वसनीय हो सकता है किन्तु ‘अनुभव से सीका’ कभी भी अविश्वसनीय नहीं हो सकता।
    आसक्ति संकुचित वृत्ति है।
    आपकी बुद्धि ही आपका गुरु है।
    आय से अधिक खर्च करने वाले तिरस्कार सहते और कष्ट भोगते हैं।
    आरोग्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।
    आहार से मनुष्य का स्वभाव और प्रकृति तय होती है, शाकाहार से स्वभाव शांत रहता है, मांसाहार मनुष्य को उग्र बनाता है।
    आयुर्वेद हमारी मिट्टी हमारी संस्कृति व प्रकृती से जुड़ी हुई निरापद चिकित्सा पद्धति है।
    आयुर्वेद वस्तुत: जीवन जीने का ज्ञान प्रदान करता है, अत: इसे हम धर्म से अलग नहीं कर सकते। इसका उद्देश्य भी जीवन के उद्देश्य की भाँति चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति ही है।
    आनन्द प्राप्ति हेतु त्याग व संयम के पथ पर बढ़ना होगा।
    आत्मा को निर्मल बनाकर, इंद्रियों का संयम कर उसे परमात्मा के साथ मिला देने की प्रक्रिया का नाम योग है।
    आत्मा का परिष्कृत रूप ही परमात्मा है। - वाङ्गमय
    आत्मा की उत्कृष्टता संसार की सबसे बड़ी सिद्धि है।
    आत्मा का परिष्कृत रूप ही परमात्मा है।
    आत्म निर्माण का अर्थ है - भाग्य निर्माण।
    आत्म-विश्वास जीवन नैया का एक शक्तिशाली समर्थ मल्लाह है, जो डूबती नाव को पतवार के सहारे ही नहीं, वरन्‌ अपने हाथों से उठाकर प्रबल लहरों से पार कर देता है।
    आत्मा की पुकार अनसुनी न करें।
    आत्मा के संतोष का ही दूसरा नाम स्वर्ग है।
    आत्मीयता को जीवित रखने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि ग़लतियों को हम उदारतापूर्वक क्षमा करना सीखें।
    आत्म-निरीक्षण इस संसार का सबसे कठिन, किन्तु करने योग्य कर्म है।
    आत्मबल ही इस संसार का सबसे बड़ा बल है।
    आत्म-निर्माण का ही दूसरा नाम भाग्य निर्माण है।
    आत्म निर्माण ही युग निर्माण है।
    आत्मविश्वासी कभी हारता नहीं, कभी थकता नहीं, कभी गिरता नहीं और कभी मरता नहीं।
    आत्मानुभूति यह भी होनी चाहिए कि सबसे बड़ी पदवी इस संसार में मार्गदर्शक की है।
    आराम की जिन्गदी एक तरह से मौत का निमंत्रण है।
    आलस्य से आराम मिल सकता है, पर यह आराम बड़ा महँगा पड़ता है।
    आज के कर्मों का फल मिले इसमें देरी तो हो सकती है, किन्तु कुछ भी करते रहने और मनचाहे प्रतिफल पाने की छूट किसी को भी नहीं है।
    आज के काम कल पर मत टालिए।
    आज का मनुष्य अपने अभाव से इतना दुखी नहीं है, जितना दूसरे के प्रभाव से होता है।
    आदर्शों के प्रति श्रद्धा और कर्तव्य के प्रति लगन का जहाँ भी उदय हो रहा है, समझना चाहिए कि वहाँ किसी देवमानव का आविर्भाव हो रहा है।
    आदर्शवाद की लम्बी-चौड़ी बातें बखानना किसी के लिए भी सरल है, पर जो उसे अपने जीवनक्रम में उतार सके, सच्चाई और हिम्मत का धनी वही है।
    आशावाद और ईश्वरवाद एक ही रहस्य के दो नाम हैं।
    आशावादी हर कठिनाई में अवसर देखता है, पर निराशावादी प्रत्येक अवसर में कठिनाइयाँ ही खोजता है।
    आप समय को नष्ट करेंगे तो समय भी आपको नष्ट कर देगा।
    आप बच्चों के साथ कितना समय बिताते हैं, वह इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है, जितना कैसे बिताते हैं।
    आप अपनी अच्छाई का जितना अभिमान करोगे, उतनी ही बुराई पैदा होगी। इसलिए अच्छे बनो, पर अच्छाई का अभिमान मत करो।
    आस्तिकता का अर्थ है- ईश्वर विश्वास और ईश्वर विश्वास का अर्थ है एक ऐसी न्यायकारी सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार करना जो सर्वव्यापी है और कर्मफल के अनुरूप हमें गिरने एवं उठने का अवसर प्रस्तुत करती है।
    आर्थिक युद्ध में किसी राष्ट्र को नष्ट करने का सुनिश्चित तरीका है, उसकी मुद्रा को खोटा कर देना और किसी राष्ट्र की संस्कृति और पहचान को नष्ट करने का सुनिश्चित तरीका है, उसकी भाषा को हीन बना देना।



    इंसान को आंका जाता है अपने काम से। जब काम व उत्तम विचार मिलकर काम करें तो मुख पर एक नया - सा, अलग - सा तेज़ आ जाता है।
    इन्सान का जन्म ही, दर्द एवं पीडा के साथ होता है। अत: जीवन भर जीवन में काँटे रहेंगे। उन काँटों के बीच तुम्हें गुलाब के फूलों की तरह, अपने जीवन-पुष्प को विकसित करना है।
    इन दोनों व्यक्तियों के गले में पत्थर बाँधकर पानी में डूबा देना चाहिए- एक दान न करने वाला धनिक तथा दूसरा परिश्रम न करने वाला दरिद्र।
    इस दुनिया में ना कोई ज़िन्दगी जीता है, ना कोई मरता है, सभी सिर्फ़ अपना-अपना कर्ज़ चुकाते हैं।
    इस संसार में कमज़ोर रहना सबसे बड़ा अपराध है।
    इस संसार में अनेक विचार, अनेक आदर्श, अनेक प्रलोभन और अनेक भ्रम भरे पड़े हैं।
    इस संसार में प्यार करने लायक़ दो वस्तुएँ हैं - एक दु:ख और दूसरा श्रम। दु:ख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और श्रम के बिना मनुष्यत्व का विकास नहीं होता।
    'इदं राष्ट्राय इदन्न मम' मेरा यह जीवन राष्ट्र के लिए है।
    इन दिनों जाग्रत्‌ आत्मा मूक दर्शक बनकर न रहे। बिना किसी के समर्थन, विरोध की परवाह किए आत्म-प्रेरणा के सहारे स्वयंमेव अपनी दिशाधारा का निर्माण-निर्धारण करें।
    इस युग की सबसे बड़ी शक्ति शस्त्र नहीं, सद्‌विचार है।
    इतराने में नहीं, श्रेष्ठ कार्यों में ऐश्वर्य का उपयोग करो।
    इस बात पर संदेह नहीं करना चाहिये कि विचारवान और उत्साही व्यक्तियों का एक छोटा सा समूह इस संसार को बदल सकता है। वास्तव मे इस संसार को छोटे से समूह ने ही बदला है।
    इतिहास और पुराण साक्षी हैं कि मनुष्य के संकल्प के सम्मुख देव-दानव सभी पराजित हो जाते हैं।



    ईश्वर की शरण में गए बगैर साधना पूर्ण नहीं होती।
    ईश्वर उपासना की सर्वोपरि सब रोग नाशक औषधि का आप नित्य सेवन करें।
    ईश्वर अर्थात्‌ मानवी गरिमा के अनुरूप अपने को ढालने के लिए विवश करने की व्यवस्था।
    ईमान और भगवान ही मनुष्य के सच्चे मित्र है।
    ईश्वर ने आदमी को अपनी अनुकृतिका बनाया।
    ईश्वर एक ही समय में सर्वत्र उपस्थित नहीं हो सकता था , अतः उसने ‘मां’ बनाया।
    ईमानदार होने का अर्थ है - हज़ार मनकों में अलग चमकने वाला हीरा।
    ईमानदारी, खरा आदमी, भलेमानस-यह तीन उपाधि यदि आपको अपने अन्तस्तल से मिलती है तो समझ लीजिए कि आपने जीवन फल प्राप्त कर लिया, स्वर्ग का राज्य अपनी मुट्ठी में ले लिया।
    ईष्र्या न करें, प्रेरणा ग्रहण करें।
    ईष्र्या आदमी को उसी तरह खा जाती है, जैसे कपड़े को कीड़ा।



    उसकी जय कभी नहीं हो सकती, जिसका दिल पवित्र नहीं है।
    उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति होने तक मत रुको।
    उठो, जागो और तब तक रुको नहीं जब तक मंज़िल प्राप्त न हो जाये।
    उच्चस्तरीय महत्त्वाकांक्षा एक ही है कि अपने को इस स्तर तक सुविस्तृत बनाया जाय कि दूसरों का मार्गदर्शन कर सकना संभव हो सके।
    उच्चस्तरीय स्वार्थ का नाम ही परमार्थ है। परमार्थ के लिये त्याग आवश्यक है पर यह एक बहुत बडा निवेश है जो घाटा उठाने की स्थिति में नहीं आने देता।
    उदारता, सेवा, सहानुभूति और मधुरता का व्यवहार ही परमार्थ का सार है।
    उतावला आदमी सफलता के अवसरों को बहुधा हाथ से गँवा ही देता है।
    उपदेश देना सरल है, उपाय बताना कठिन।
    उत्कर्ष के साथ संघर्ष न छोड़ो!
    उत्तम पुस्तकें जाग्रत्‌ देवता हैं। उनके अध्ययन-मनन-चिंतन के द्वारा पूजा करने पर तत्काल ही वरदान पाया जा सकता है।
    ‘उत्तम होना’ एक कार्य नहीं बल्कि स्वभाव होता है।
    उत्तम ज्ञान और सद्‌विचार कभी भी नष्ट नहीं होते हैं।
    उत्कृष्टता का दृष्टिकोण ही जीवन को सुरक्षित एवं सुविकसित बनाने एकमात्र उपाय है।
    उत्कृष्ट जीवन का स्वरूप है- दूसरों के प्रति नम्र और अपने प्रति कठोर होना।
    उनसे दूर रहो जो भविष्य को निराशाजनक बताते हैं।
    उपासना सच्ची तभी है, जब जीवन में ईश्वर घुल जाए।
    उन्नति के किसी भी अवसर को खोना नहीं चाहिए।
    उनकी प्रशंसा करो जो धर्म पर दृढ़ हैं। उनके गुणगान न करो, जिनने अनीति से सफलता प्राप्त की।
    उनकी नकल न करें जिनने अनीतिपूर्वक कमाया और दुव्र्यसनों में उड़ाया। बुद्धिमान कहलाना आवश्यक नहीं। चतुरता की दृष्टि से पक्षियों में कौवे को और जानवरों में चीते को प्रमुख गिना जाता है। ऐसे चतुरों और दुस्साहसियों की बिरादरी जेलखानों में बनी रहती है। ओछों की नकल न करें। आदर्शों की स्थापना करते समय श्रेष्ठ, सज्जनों को, उदार महामानवों को ही सामने रखें।
    उद्धेश्य निश्चित कर लेने से आपके मनोभाव आपके आशापूर्ण विचार आपकी महत्वकांक्षाये एक चुम्बक का काम करती हैं। वे आपके उद्धेश्य की सिद्धी को सफलता की ओर खींचती हैं।
    उद्धेश्य प्राप्ति हेतु कर्म, विचार और भावना का धु्रवीकरण करना चाहिये।
    उनसे कभी मित्रता न कर, जो तुमसे बेहतर नहीं।



    ऊंचे उद्देश्य का निर्धारण करने वाला ही उज्ज्वल भविष्य को देखता है।
    ऊँचे सिद्धान्तों को अपने जीवन में धारण करने की हिम्मत का नाम है - अध्यात्म।
    ऊँचे उठो, प्रसुप्त को जगाओं, जो महान् है उसका अवलम्बन करो ओर आगे बढ़ो।
    ऊद्यम ही सफलता की कुंजी है।
    ऊपर की ओर चढ़ना कभी भी दूसरों को पैर के नीचे दबाकर नहीं किया जा सकता वरना ऐसी सफलता भूत बनकर आपका भविष्य बिगाड़ देगी।



    एक ही पुत्र यदि विद्वान् और अच्छे स्वभाव वाला हो तो उससे परिवार को ऐसी ही खुशी होती है, जिस प्रकार एक चन्द्रमा के उत्पन्न होने पर काली रात चांदनी से खिल उठती है।
    एक झूठ छिपाने के लिये दस झूठ बोलने पडते हैं।
    एक गुण समस्त दोषो को ढक लेता है।
    एक सत्य का आधार ही व्यक्ति को भवसागर से पार कर देता है।
    एक बार लक्ष्य निर्धारित करने के बाद बाधाओं और व्यवधानों के भय से उसे छोड़ देना कायरता है। इस कायरता का कलंक किसी भी सत्पुरुष को नहीं लेना चाहिए।
    एकांगी अथवा पक्षपाती मस्तिष्क कभी भी अच्छा मित्र नहीं रहता।
    एकाग्रता से ही विजय मिलती है।
    एक शेर को भी मक्खियों से अपनी रक्षा करनी पड़ती है।



    कोई भी साधना कितनी ही ऊँची क्यों न हो, सत्य के बिना सफल नहीं हो सकती।
    कोई भी कठिनाई क्यों न हो, अगर हम सचमुच शान्त रहें तो समाधान मिल जाएगा।
    कोई भी कार्य सही या ग़लत नहीं होता, हमारी सोच उसे सही या ग़लत बनाती है।
    कोई भी इतना धनि नहीं कि पड़ौसी के बिना काम चला सके।
    कोई अपनी चमड़ी उखाड़ कर भीतर का अंतरंग परखने लगे तो उसे मांस और हड्डियों में एक तत्व उफनता दृष्टिगोचर होगा, वह है असीम प्रेम। हमने जीवन में एक ही उपार्जन किया है प्रेम। एक ही संपदा कमाई है - प्रेम। एक ही रस हमने चखा है वह है प्रेम का।
    कई बच्चे हज़ारों मील दूर बैठे भी माता - पिता से दूर नहीं होते और कई घर में साथ रहते हुई भी हज़ारों मील दूर होते हैं।
    कर्म सरल है, विचार कठिन।
    कर्म करने में ही अधिकार है, फल में नहीं।
    कर्म ही मेरा धर्म है। कर्म ही मेरी पूजा है।
    कर्म करनी ही उपासना करना है, विजय प्राप्त करनी ही त्याग करना है। स्वयं जीवन ही धर्म है, इसे प्राप्त करना और अधिकार रखना उतना ही कठोर है जितना कि इसका त्याग करना और विमुख होना।
    कर्म ही पूजा है और कर्त्तव्य पालन भक्ति है।
    कर्म भूमि पर फ़ल के लिए श्रम सबको करना पड़ता है। रब सिर्फ़ लकीरें देता है रंग हमको भरना पड़ता है।
    किसी को आत्म-विश्वास जगाने वाला प्रोत्साहन देना ही सर्वोत्तम उपहार है।
    किसी सदुद्देश्य के लिए जीवन भर कठिनाइयों से जूझते रहना ही महापुरुष होना है।
    किसी महान् उद्देश्य को न चलना उतनी लज्जा की बात नहीं होती, जितनी कि चलने के बाद कठिनाइयों के भय से पीछे हट जाना।
    किसी को ग़लत मार्ग पर ले जाने वाली सलाह मत दो।
    किसी के दुर्वचन कहने पर क्रोध न करना क्षमा कहलाता है।
    किसी से ईर्ष्या करके मनुष्य उसका तो कुछ बिगाड़ नहीं सकता है, पर अपनी निद्रा, अपना सुख और अपना सुख-संतोष अवश्य खो देता है।
    किसी महान् उद्देश्य को लेकर न चलना उतनी लज्जा की बात नहीं होती, जितनी कि चलने के बाद कठिनाइयों के भय से रुक जाना अथवा पीछे हट जाना।
    किसी वस्तु की इच्छा कर लेने मात्र से ही वह हासिल नहीं होती, इच्छा पूर्ति के लिए कठोर परिश्रम व प्रयत्न आवश्यक होता हैं।
    किसी बेईमानी का कोई सच्चा मित्र नहीं होता।
    किसी समाज, देश या व्यक्ति का गौरव अन्याय के विरुद्ध लड़ने में ही परखा जा सकता है।
    किसी का अमंगल चाहने पर स्वयं पहले अपना अमंगल होता है।
    किसी भी व्यक्ति को मर्यादा में रखने के लिये तीन कारण ज़िम्मेदार होते हैं - व्यक्ति का मष्तिष्क, शारीरिक संरचना और कार्यप्रणाली, तभी उसके व्यक्तित्व का सामान्य विकास हो पाता है।
    किसी का बुरा मत सोचो; क्योंकि बुरा सोचते-सोचते एक दिन अच्छा-भला व्यक्ति भी बुरे रास्ते पर चल पड़ता है।
    किसी आदर्श के लिए हँसते-हँसते जीवन का उत्सर्ग कर देना सबसे बड़ी बहादुरी है।
    किसी को हृदय से प्रेम करना शक्ति प्रदान करता है और किसी के द्वारा हृदय से प्रेम किया जाना साहस।
    किसी का मनोबल बढ़ाने से बढ़कर और अनुदान इस संसार में नहीं है।
    काल (समय) सबसे बड़ा देवता है, उसका निरादर मत करा॥
    कामना करने वाले कभी भक्त नहीं हो सकते। भक्त शब्द के साथ में भगवान की इच्छा पूरी करने की बात जुड़ी रहती है।
    कर्त्तव्यों के विषय में आने वाले कल की कल्पना एक अंध-विश्वास है।
    कर्त्तव्य पालन ही जीवन का सच्चा मूल्य है।
    कभी-कभी मौन से श्रेष्ठ उत्तर नहीं होता, यह मंत्र याद रखो और किसी बात के उत्तर नहीं देना चाहते हो तो हंसकर पूछो- आप यह क्यों जानना चाहते हों?
    क्रोध बुद्धि को समाप्त कर देता है। जब क्रोध समाप्त हो जाता है तो बाद में बहुत पश्चाताप होता है।
    क्रोध का प्रत्येक मिनट आपकी साठ सेकण्डों की खुशी को छीन लेता है।
    कल की असफलता वह बीज है जिसे आज बोने पर आने वाले कल में सफलता का फल मिलता है।
    कठिन परिश्रम का कोई भी विकल्प नहीं होता।
    कुमति व कुसंगति को छोड़ अगर सुमति व सुसंगति को बढाते जायेंगे तो एक दिन सुमार्ग को आप अवश्य पा लेंगे।
    कुकर्मी से बढ़कर अभागा और कोई नहीं है; क्योंकि विपत्ति में उसका कोई साथी नहीं होता।
    कार्य उद्यम से सिद्ध होते हैं, मनोरथों से नहीं।
    कुचक्र, छद्‌म और आतंक के बलबूते उपार्जित की गई सफलताएँ जादू के तमाशे में हथेली पर सरसों जमाने जैसे चमत्कार दिखाकर तिरोहित हो जाती हैं। बिना जड़ का पेड़ कब तक टिकेगा और किस प्रकार फलेगा-फूलेगा।
    केवल ज्ञान ही एक ऐसा अक्षय तत्त्व है, जो कहीं भी, किसी अवस्था और किसी काल में भी मनुष्य का साथ नहीं छोड़ता।
    काम छोटा हो या बड़ा, उसकी उत्कृष्टता ही करने वाले का गौरव है।
    कीर्ति वीरोचित कार्यों की सुगन्ध है।
    कायर मृत्यु से पूर्व अनेकों बार मर चुकता है, जबकि बहादुर को मरने के दिन ही मरना पड़ता है।
    करना तो बड़ा काम, नहीं तो बैठे रहना, यह दुराग्रह मूर्खतापूर्ण है।
    कुसंगी है कोयलों की तरह, यदि गर्म होंगे तो जलाएँगे और ठंडे होंगे तो हाथ और वस्त्र काले करेंगे।
    क्या तुम नहीं अनुभव करते कि दूसरों के ऊपर निर्भर रहना बुद्धिमानी नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति को अपने ही पैरों पर दृढता पूर्वक खडा होकर कार्य करना चहिए। धीरे धीरे सब कुछ ठीक हो जाएगा।
    कमज़ोरी का इलाज कमज़ोरी का विचार करना नहीं, पर शक्ति का विचार करना है। मनुष्यों को शक्ति की शिक्षा दो, जो पहले से ही उनमें हैं।
    काली मुरग़ी भी सफ़ेद अंडा देती है।
    कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो इसलिए आत्महत्या नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि लोग क्या कहेंगे।
    कुछ लोग दुर्भीति (Phobia) के शिकार हो जाते हैं उन्हें उनकी क्षमता पर पूरा विश्वास नहीं रहता और वे सोचते हैं प्रतियोगिता के दौड़ में अन्य प्रतियोगी आगे निकल जायेंगे।
    कंजूस के पास जितना होता है उतना ही वह उस के लिए तरसता है जो उस के पास नहीं होता।



    खुशामद बड़े-बड़ों को ले डूबती है।
    खुद साफ़ रहो, सुरक्षित रहो और औरों को भी रोगों से बचाओं।
    खरे बनिये, खरा काम कीजिए और खरी बात कहिए। इससे आपका हृदय हल्का रहेगा।
    खुश होने का यह अर्थ नहीं है कि जीवन में पूर्णता है बल्कि इसका अर्थ है कि आपने जीवन की अपूर्णता से परे रहने का निश्चय कर लिया है।
    खेती, पाती, बीनती, औ घोड़े की तंग । अपने हाथ संवारिये चाहे लाख लोग हो संग ।। खेती करना, पत्र लिखना और पढ़ना, तथा घोड़ा या जिस वाहन पर सवारी करनी हो उसकी जॉंच और तैयारी मनुष्‍य को स्‍वयं ही खुद करना चाहिये भले ही लाखों लोग साथ हों और अनेकों सेवक हों, वरना मनुष्‍य का नुकसान तय शुदा है।



    गुण व कर्म से ही व्यक्ति स्वयं को ऊपर उठाता है। जैसे कमल कहाँ पैदा हुआ, इसमें विशेषता नहीं, बल्कि विशेषता इसमें है कि, कीचड़ में रहकर भी उसने स्वयं को ऊपर उठाया है।
    गुण और दोष प्रत्येक व्यक्ति में होते हैं, योग से जुड़ने के बाद दोषों का शमन हो जाता है और गुणों में बढ़ोत्तरी होने लगती है।
    गुण, कर्म और स्वभाव का परिष्कार ही अपनी सच्ची सेवा है।
    गुण ही नारी का सच्चा आभूषण है।
    गुणों की वृद्धि और क्षय तो अपने कर्मों से होता है।
    गृहस्थ एक तपोवन है, जिसमें संयम, सेवा और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है।
    गायत्री उपासना का अधिकर हर किसी को है। मनुष्य मात्र बिना किसी भेदभाव के उसे कर सकता है।
    ग़लती को ढूढना, मानना और सुधारना ही मनुष्य का बड़प्पन है।
    ग़लती करना मनुष्यत्व है और क्षमा करना देवत्व।
    गृहसि एक तपोवन है जिसमें संयम, सेवा, त्याग और सहिष्णुता की साधना करनी पड़ती है।
    गंगा की गोद, हिमालय की छाया, ऋषि विश्वामित्र की तप:स्थली, अजस्त्र प्राण ऊर्जा का उद्‌भव स्रोत गायत्री तीर्थ शान्तिकुञ्ज जैसा जीवन्त स्थान उपासना के लिए दूसरा ढूँढ सकना कठिन है।
    गाली-गलौज, कर्कश, कटु भाषण, अश्लील मजाक, कामोत्तेजक गीत, निन्दा, चुगली, व्यंग, क्रोध एवं आवेश भरा उच्चारण, वाणी की रुग्णता प्रकट करते हैं। ऐसे शब्द दूसरों के लिए ही मर्मभेदी नहीं होते वरन्‌ अपने लिए भी घातक परिणाम उत्पन्न करते हैं।
    खेती, पाती, बीनती, औ घोड़े की तंग । अपने हाथ संवारिये चाहे लाख लोग हो संग ।। खेती करना, पत्र लिखना और पढ़ना, तथा घोड़ा या जिस वाहन पर सवारी करनी हो उसकी जॉंच और तैयारी मनुष्‍य को स्‍वयं ही खुद करना चाहिये भले ही लाखों लोग साथ हों और अनेकों सेवक हों, वरना मनुष्‍य का नुकसान तय शुदा है।



    घृणा करने वाला निन्दा, द्वेष, ईर्ष्या करने वाले व्यक्ति को यह डर भी हमेशा सताये रहता है, कि जिससे मैं घृणा करता हूँ, कहीं वह भी मेरी निन्दा व मुझसे घृणा न करना शुरू कर दे।



    चरित्र का अर्थ है - अपने महान् मानवीय उत्तरदायित्वों का महत्त्व समझना और उसका हर कीमत पर निर्वाह करना।
    चरित्र ही मनुष्य की श्रेष्ठता का उत्तम मापदण्ड है।
    चरित्रवान्‌ व्यक्ति ही किसी राष्ट्र की वास्तविक सम्पदा है। - वाङ्गमय
    चरित्रवान व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में भगवद्‌ भक्त हैं।
    चरित्रनिष्ठ व्यक्ति ईश्वर के समान है।
    चिंतन और मनन बिना पुस्तक बिना साथी का स्वाध्याय-सत्संग ही है।
    चिता मरे को जलाती है, पर चिन्ता तो जीवित को ही जला डालती है।
    चोर, उचक्के, व्यसनी, जुआरी भी अपनी बिरादरी निरंतर बढ़ाते रहते हैं । इसका एक ही कारण है कि उनका चरित्र और चिंतन एक होता है। दोनों के मिलन पर ही प्रभावोत्पादक शक्ति का उद्‌भव होता है। किंतु आदर्शों के क्षेत्र में यही सबसे बड़ी कमी है।
    चेतना के भावपक्ष को उच्चस्तरीय उत्कृष्टता के साथ एकात्म कर देने को 'योग' कहते हैं।
    चिल्‍ला कर और झल्‍ला कर बातें करना, बिना सलाह मांगे सलाह देना, किसी की मजबूरी में अपनी अहमियत दर्शाना और सिद्ध करना, ये कार्य दुनिया का सबसे कमज़ोर और असहाय व्‍यक्ति करता है, जो खुद को ताकतवर समझता है और जीवन भर बेवकूफ बनता है, घृणा का पात्र बन कर दर दर की ठोकरें खाता है।



    जीवन का महत्त्वा इसलिये है, ख्योंकी मृत्यु है। मृत्यु न हो तो ज़िन्दगी बोझ बन जायेगी. इसलिये मृत्यु को दोस्त बनाओ, उसी दरो नहीं।
    जीवन का हर क्षण उज्ज्वल भविष्य की संभावना लेकर आता है।
    जीवन का अर्थ है समय। जो जीवन से प्यार करते हों, वे आलस्य में समय न गँवाएँ।
    जीवन को विपत्तियों से धर्म ही सुरक्षित रख सकता है।
    जीवन चलते रहने का नाम है। सोने वाला सतयुग में रहता है, बैठने वाला द्वापर में, उठ खडा होने वाला त्रेता में, और चलने वाला सतयुग में, इसलिए चलते रहो।
    जीवन उसी का धन्य है जो अनेकों को प्रकाश दे। प्रभाव उसी का धन्य है जिसके द्वारा अनेकों में आशा जाग्रत हो।
    जीवन एक परख और कसौटी है जिसमें अपनी सामथ्र्य का परिचय देने पर ही कुछ पा सकना संभव होता है।
    जीवन की सफलता के लिए यह नितांत आवश्यक है कि हम विवेकशील और दूरदर्शी बनें।
    जीवन की माप जीवन में ली गई साँसों की संख्या से नहीं होती बल्कि उन क्षणों की संख्या से होती है जो हमारी साँसें रोक देती हैं।
    जीवन भगवान की सबसे बड़ी सौगात है। मनुष्य का जन्म हमारे लिए भगवान का सबसे बड़ा उपहार है।
    जीवन के आनन्द गौरव के साथ, सम्मान के साथ और स्वाभिमान के साथ जीने में है।
    जीवन के प्रकाशवान्‌ क्षण वे हैं, जो सत्कर्म करते हुए बीते।
    जीवन साधना का अर्थ है - अपने समय, श्रम ओर साधनों का कण-कण उपयोगी दिशा में नियोजित किये रहना। - वाङ्गमय
    जीवन दिन काटने के लिए नहीं, कुछ महान् कार्य करने के लिए है।
    जीवन उसी का सार्थक है, जो सदा परोपकार में प्रवृत्त है।
    जीवन एक पाठशाला है, जिसमें अनुभवों के आधार पर हम शिक्षा प्राप्त करते हैं।
    जीवन एक परीक्षा है। उसे परीक्षा की कसौटी पर सर्वत्र कसा जाता है।
    जीवन एक पुष्प है और प्रेम उसका मधु है।
    जीवन और मृत्यु में, सुख और दुःख मे ईश्वर समान रूप से विद्यमान है। समस्त विश्व ईश्वर से पूर्ण हैं। अपने नेत्र खोलों और उसे देखों।
    जीवन में एक मित्र मिल गया तो बहुत है, दो बहुत अधिक है, तीन तो मिल ही नहीं सकते।
    जीवनी शक्ति पेड़ों की जड़ों की तरह भीतर से ही उपजती है।
    जीवनोद्देश्य की खोज ही सबसे बड़ा सौभाग्य है। उसे और कहीं ढूँढ़ने की अपेक्षा अपने हृदय में ढूँढ़ना चाहिए।
    जब भी आपको महसूस हो, आपसे ग़लती हो गयी है, उसे सुधारने के उपाय तुरंत शुरू करो।
    जब कभी भी हारो, हार के कारणों को मत भूलो।
    जब हम किसी पशु-पक्षी की आत्मा को दु:ख पहुँचाते हैं, तो स्वयं अपनी आत्मा को दु:ख पहुँचाते हैं।
    जब तक मानव के मन में मैं (अहंकार) है, तब तक वह शुभ कार्य नहीं कर सकता, क्योंकि मैं स्वार्थपूर्ति करता है और शुद्धता से दूर रहता है।
    जब आगे बढ़ना कठिन होता है, तब कठिन परिश्रमी ही आगे बढ़ता है।
    जब तक मनुष्य का लक्ष्य भोग रहेगा, तब तक पाप की जड़ें भी विकसित होती रहेंगी।
    जब अंतराल हुलसता है, तो तर्कवादी के कुतर्की विचार भी ठण्डे पड़ जाते हैं।
    जब मनुष्य दूसरों को भी अपना जीवन सार्थक करने को प्रेरित करता है तो मनुष्य के जीवन में सार्थकता आती है।
    जब तक तुम स्वयं अपने अज्ञान को दूर करने के लिए कटिबद्ध नहीं होत, तब तक कोई तुम्हारा उद्धार नहीं कर सकता।
    जब तक आत्मविश्वास रूपी सेनापति आगे नहीं बढ़ता तब तक सब शक्तियाँ चुपचाप खड़ी उसका मुँह ताकती रहती हैं।
    जब संकटों के बादल सिर पर मँडरा रहे हों तब भी मनुष्य को धैर्य नहीं छोड़ना चाहिए। धैर्यवान व्यक्ति भीषण परिस्थितियों में भी विजयी होते हैं।
    जब मेरा अन्तर्जागरण हुआ, तो मैंने स्वयं को संबोधि वृक्ष की छाया में पूर्ण तृप्त पाया।
    जब आत्मा मन से, मन इन्द्रिय से और इन्द्रिय विषय से जुडता है, तभी ज्ञान प्राप्त हो पाता है।
    जब-जब हृदय की विशालता बढ़ती है, तो मन प्रफुल्लित होकर आनंद की प्राप्ति कर्ता है और जब संकीर्ण मन होता है, तो व्यक्ति दुःख भोगता है।
    जिस तरह से एक ही सूखे वृक्ष में आग लगने से सारा जंगल जलकर राख हो सकता है, उसी प्रकार एक मूर्ख पुत्र सारे कुल को नष्ट कर देता है।
    जिस में दया नहीं, उस में कोई सदगुण नहीं।
    जिस प्रकार सुगन्धित फूलों से लदा एक वृक्ष सारे जंगले को सुगन्धित कर देता है, उसी प्रकार एक सुपुत्र से वंश की शोभा बढती है।
    जिस प्रकार मैले दर्पण में सूरज का प्रतिबिम्‍ब नहीं पड़ता, उसी प्रकार मलिन अंत:करण में ईश्‍वर के प्रकाश का प्रतिबिम्‍ब नहीं पड़ सकता।
    जिस तेज़ी से विज्ञान की प्रगति के साथ उपभोग की वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में बनना शुरू हो गयी हैं, वे मनुष्य के लिये पिंजरा बन रही हैं।
    जिस व्यक्ति का मन चंचल रहता है, उसकी कार्यसिद्धि नहीं होती।
    जिस राष्ट्र में विद्वान् सताए जाते हैं, वह विपत्तिग्रस्त होकर वैसे ही नष्ट हो जाता है, जैसे टूटी नौका जल में डूबकर नष्ट हो जाती है।
    जिस कर्म से किन्हीं मनुष्यों या अन्य प्राणियों को किसी भी प्रकार का कष्ट या हानि पहुंचे, वे ही दुष्कर्म कहलाते हैं।
    जिस आदर्श के व्यवहार का प्रभाव न हो, वह फिजूल है और जो व्यवहार आदर्श प्रेरित न हो, वह भयंकर है।
    जिस आदर्श के व्यवहार का प्रभाव न हो, वह फिजूल और जो व्यवहार आदर्श प्रेरित न हो, वह भयंकर है।
    जिस भी भले बुरे रास्ते पर चला जाये उस पर साथी - सहयोगी तो मिलते ही रहते हैं। इस दुनिया में न भलाई की कमी है, न बुराई की। पसंदगी अपनी, हिम्मत अपनी, सहायता दुनिया की।
    जिस प्रकार हिमालय का वक्ष चीरकर निकलने वाली गंगा अपने प्रियतम समुद्र से मिलने का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए तीर की तरह बहती-सनसनाती बढ़ती चली जाती है और उसक मार्ग रोकने वाले चट्टान चूर-चूर होते चले जाते हैं उसी प्रकार पुषार्थी मनुष्य अपने लक्ष्य को अपनी तत्परता एवं प्रखरता के आधार पर प्राप्त कर सकता है।
    जिस दिन, जिस क्षण किसी के अंदर बुरा विचार आये अथवा कोई दुष्कर्म करने की प्रवृत्ति उपजे, मानना चाहिए कि वह दिन-वह क्षण मनुष्य के लिए अशुभ है।
    जो कार्य प्रारंभ में कष्टदायक होते हैं, वे परिणाम में अत्यंत सुखदायक होते हैं।
    जो मिला है और मिल रहा है, उससे संतुष्ट रहो।
    जो दानदाता इस भावना से सुपात्र को दान देता है कि, तेरी (परमात्मा) वस्तु तुझे ही अर्पित है; परमात्मा उसे अपना प्रिय सखा बनाकर उसका हाथ थामकर उसके लिये धनों के द्वार खोल देता है; क्योंकि मित्रता सदैव समान विचार और कर्मों के कर्ता में ही होती है, विपरीत वालों में नहीं।
    जो व्यक्ति कभी कुछ कभी कुछ करते हैं, वे अन्तत: कहीं भी नहीं पहुँच पाते।
    जो सच्चाई के मार्ग पर चलता है, वह भटकता नहीं।
    जो न दान देता है, न भोग करता है, उसका धन स्वतः नष्ट हो जाता है। अतः योग्य पात्र को दान देना चाहिए।
    जो व्यक्ति हर स्थिति में प्रसन्न और शांत रहना सीख लेता है, वह जीने की कला प्राणी मात्र के लिये कल्याणकारी है।
    जो व्यक्ति आचरण की पोथी को नहीं पढता, उसके पृष्ठों को नहीं पलटता, वह भला दूसरों का क्या भला कर पायेगा।
    जो व्यक्ति शत्रु से मित्र होकर मिलता है, व धूल से धन बना सकता है।
    जो मनुष्य अपने समीप रहने वालों की तो सहायता नहीं करता, किन्तु दूरस्थ की सहायता करता है, उसका दान, दान न होकर दिखावा है।
    जो आलस्य और कुकर्म से जितना बचता है, वह ईश्वर का उतना ही बड़ा भक्त है।
    जो टूटे को बनाना, रूठे को मनाना जानता है, वही बुद्धिमान है।
    जो जैसा सोचता है और करता है, वह वैसा ही बन जाता है।
    जो अपनी राह बनाता है वह सफलता के शिखर पर चढ़ता है; पर जो औरों की राह ताकता है सफलता उसकी मुँह ताकती रहती है।
    जो बच्चों को सिखाते हैं, उन पर बड़े खुद अमल करें, तो यह संसार स्वर्ग बन जाय।
    जो प्रेरणा पाप बनकर अपने लिए भयानक हो उठे, उसका परित्याग कर देना ही उचित है।
    जो क्षमा करता है और बीती बातों को भूल जाता है, उसे ईश्वर पुरस्कार देता है।
    जो संसार से ग्रसित रहता है, वह बुद्धू तो हो सकता; लेकिन बुद्ध नहीं हो सकता।
    जो किसी की निन्दा स्तुति में ही अपने समय को बर्बाद करता है, वह बेचारा दया का पात्र है, अबोध है।
    जो मनुष्य मन, वचन और कर्म से, ग़लत कार्यों से बचा रहता है, वह स्वयं भी प्रसन्न रहता है।।
    जो दूसरों को धोखा देना चाहता है, वास्तव में वह अपने आपको ही धोखा देता है।
    जो बीत गया सो गया, जो आने वाला है वह अज्ञात है! लेकिन वर्तमान तो हमारे हाथ में है।
    जो तुम दूसरों से चाहते हो, उसे पहले तुम स्वयं करो।
    जो असत्य को अपनाता है, वह सब कुछ खो बैठता है।
    जो लोग डरने, घबराने में जितनी शक्ति नष्ट करते हैं, उसकी आधी भी यदि प्रस्तुत कठिनाइयों से निपटने का उपाय सोचने के लिए लगाये तो आधा संकट तो अपने आप ही टल सकता है।
    जो मन का ग़ुलाम है, वह ईश्वर भक्त नहीं हो सकता। जो ईश्वर भक्त है, उसे मन की ग़ुलामी न स्वीकार हो सकती है, न सहन।
    जो लोग पाप करते हैं उन्हें एक न एक विपत्ति सवदा घेरे ही रहती है, किन्तु जो पुण्य कर्म किया करते हैं वे सदा सुखी और प्रसन्न रह्ते हैं।
    जो हमारे पास है, वह हमारे उपयोग, उपभोग के लिए है यही असुर भावना है।
    जो तुम दूसरे से चाहते हो, उसे पहले स्वयं करो।
    जो हम सोचते हैं सो करते हैं और जो करते हैं सो भुगतते हैं।
    जो मन की शक्ति के बादशाह होते हैं, उनके चरणों पर संसार नतमस्तक होता है।
    जो जैसा सोचता और करता है, वह वैसा ही बन जाता है।
    जो महापुरुष बनने के लिए प्रयत्नशील हैं, वे धन्य है।
    जो शत्रु बनाने से भय खाता है, उसे कभी सच्चे मित्र नहीं मिलेंगे।
    जो समय को नष्‍ट करता है, समय भी उसे नष्‍ट कर देता है, समय का हनन करने वाले व्‍यक्ति का चित्‍त सदा उद्विग्‍न रहता है, और वह असहाय तथा भ्रमित होकर यूं ही भटकता रहता है, प्रति पल का उपयोग करने वाले कभी भी पराजित नहीं हो सकते, समय का हर क्षण का उपयोग मनुष्‍य को विलक्षण और अदभुत बना देता है।
    जो किसी से कुछ ले कर भूल जाते हैं, अपने ऊपर किये उपकार को मानते नहीं, अहसान को भुला देते हैं उल्‍हें कृतघ्‍नी कहा जाता है, और जो सदा इसे याद रख कर प्रति उपकार करने और अहसान चुकाने का प्रयास करते हैं उन्‍हें कृतज्ञ कहा जाता है।
    जो विषपान कर सकता है, चाहे विष परा‍जय का हो, चाहे अपमान का, वही शंकर का भक्‍त होने योग्‍य है और उसे ही शिवत्‍व की प्राप्ति संभव है, अपमान और पराजय से विचलित होने वाले लोग शिव भक्‍त होने योग्‍य ही नहीं, ऐसे लोगों की शिव पूजा केवल पाखण्‍ड है।
    जैसे का साथ तैसा वह भी ब्‍याज सहित व्‍यवहार करना ही सर्वोत्‍तम नीति है, शठे शाठयम और उपदेशो हि मूर्खाणां प्रकोपाय न शान्‍तये के सूत्र को अमल मे लाना ही गुणकारी उपाय है।
    जैसे बाहरी जीवन में युक्ति व शक्ति ज़रूरी है, वैसे ही आतंरिक जीवन के लिये मुक्ति व भक्ति आवश्यक है।
    जैसे प्रकृति का हर कारण उपयोगी है, ऐसे ही हमें अपने जीवन के हर क्षण को परहित में लगाकर स्वयं और सभी के लिये उपयोगी बनाना चाहिए।
    जैसे एक अच्छा गीत तभी सम्भव है, जब संगीत व शब्द लयबद्ध हों; वैसे ही अच्छे नेतृत्व के लिये ज़रूरी है कि आपकी करनी एवं कथनी में अंतर न हो।
    जैसा अन्न, वैसा मन।
    जैसा खाय अन्न, वैसा बने मन।
    जैसे कोरे काग़ज़ पर ही पत्र लिखे जा सकते हैं, लिखे हुए पर नहीं, उसी प्रकार निर्मल अंत:करण पर ही योग की शिक्षा और साधना अंकित हो सकती है।
    जहाँ वाद - विवाद होता है, वहां श्रद्धा के फूल नहीं खिल सकते और जहाँ जीवन में आस्था व श्रद्धा को महत्त्व न मिले, वहां जीवन नीरस हो जाता है।
    जहाँ भी हो, जैसे भी हो, कर्मशील रहो, भाग्य अवश्य बदलेगा; अतः मनुष्य को कर्मवादी होना चाहिए, भाग्यवादी नहीं।
    जहाँ सत्य होता है, वहां लोगों की भीड़ नहीं हुआ करती; क्योंकि सत्य ज़हर होता है और ज़हर को कोई पीना या लेना नहीं चाहता है, इसलिए आजकल हर जगह मेला लगा रहता है।
    जहाँ मैं और मेरा जुड़ जाता है, वहाँ ममता, प्रेम, करुणा एवं समर्पण होते हैं।
    जूँ, खटमल की तरह दूसरों पर नहीं पलना चाहिए, बल्कि अंत समय तक कार्य करते जाओ; क्योंकि गतिशीलता जीवन का आवश्यक अंग है।
    जनसंख्या की अभिवृद्धि हज़ार समस्याओं की जन्मदात्री है।
    जानकारी व वैदिक ज्ञान का भार तो लोग सिर पर गधे की तरह उठाये फिरते हैं और जल्द अहंकारी भी हो जाते हैं, लेकिन उसकी सरलता का आनंद नहीं उठा सकते हैं।
    ज़्यादा पैसा कमाने की इच्छा से ग्रसित मनुष्य झूठ, कपट, बेईमानी, धोखेबाज़ी, विश्वाघात आदि का सहारा लेकर परिणाम में दुःख ही प्राप्त करता है।
    जिसने जीवन में स्नेह, सौजन्य का समुचित समावेश कर लिया, सचमुच वही सबसे बड़ा कलाकार है।
    जिसका हृदय पवित्र है, उसे अपवित्रता छू तक नहीं सकता।
    जिनका प्रत्येक कर्म भगवान को, आदर्शों को समर्पित होता है, वही सबसे बड़ा योगी है।
    जिसका मन-बुद्धि परमात्मा के प्रति वफ़ादार है, उसे मन की शांति अवश्य मिलती है।
    जिसकी मुस्कुराहट कोई छीन न सके, वही असल सफ़ा व्यक्ति है।
    जिसकी इन्द्रियाँ वश में हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।
    जिनकी तुम प्रशंसा करते हो, उनके गुणों को अपनाओ और स्वयं भी प्रशंसा के योग्य बनो।
    जिसके पास कुछ नहीं रहता, उसके पास भगवान रहता है।
    जिनके अंदर ऐय्याशी, फिजूलखर्ची और विलासिता की कुर्बानी देने की हिम्मत नहीं, वे अध्यात्म से कोसों दूर हैं।
    जिसके मन में राग-द्वेष नहीं है और जो तृष्‍णा को, त्‍याग कर शील तथा संतोष को ग्रहण किए हुए है, वह संत पुरुष जगत् के लिए जहाज़ है।
    जिसके पास कुछ भी कर्ज़ नहीं, वह बड़ा मालदार है।
    जिनके भीतर-बाहर एक ही बात है, वही निष्कपट व्यक्ति धन्य है।
    जिसने शिष्टता और नम्रता नहीं सीखी, उनका बहुत सीखना भी व्यर्थ रहा।
    जिन्हें लम्बी ज़िन्दगी जीना हो, वे बिना कड़ी भूख लगे कुछ भी न खाने की आदत डालें।
    जिज्ञासा के बिना ज्ञान नहीं होता।
    जौ भौतिक महत्त्वाकांक्षियों की बेतरह कटौती करते हुए समय की पुकार पूरी करने के लिए बढ़े-चढ़े अनुदान प्रस्तुत करते और जिसमें महान् परम्परा छोड़ जाने की ललक उफनती रहे, यही है - प्रज्ञापुत्र शब्द का अर्थ।
    ज़माना तब बदलेगा, जब हम स्वयं बदलेंगे।
    जाग्रत आत्माएँ कभी चुप बैठी ही नहीं रह सकतीं। उनके अर्जित संस्कार व सत्साहस युग की पुकार सुनकर उन्हें आगे बढ़ने व अवतार के प्रयोजनों हेतु क्रियाशील होने को बाध्य कर देते हैं।
    जाग्रत अत्माएँ कभी अवसर नहीं चूकतीं। वे जिस उद्देश्य को लेकर अवतरित होती हैं, उसे पूरा किये बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता।
    जाग्रत्‌ आत्मा का लक्षण है- सत्यम्‌, शिवम्‌ और सुन्दरम्‌ की ओर उन्मुखता।
    जीभ पर काबू रखो, स्वाद के लिए नहीं, स्वास्थ्य के लिए खाओ।



    झूठे मोती की आब और ताब उसे सच्चा नहीं बना सकती।
    झूठ इन्सान को अंदर से खोखला बना देता है।



    ठगना बुरी बात है, पर ठगाना उससे कम बुरा नहीं है।



    डरपोक और शक्तिहीन मनुष्य भाग्य के पीछे चलता है।

त्र

    त्रुटियाँ या भूल कैसी भी हो वे आपकी प्रगति में भयंकर रूप से बाधक होती है।

मंगळवार, २६ सप्टेंबर, २०१७

अनमोल वचन 1

बुद्धिमानो की बुद्धिमता और बरसों का अनुभव सुभाषितों में संग्रह किया जा सकता है। - आईजक दिसराली

    हम अनमोल वचन ( Priceless Words / Quotes) (अमृत वचन/ सुविचार/ सुवचन/ सत्य वचन/ सूक्ति/ सुभाषित/ उत्तम (उत्‍तम) वाणी/ उद्धरण/ धीर गंभीर मृदु वाक्‍य)उन बातों और लेखों को कहते हैं, जिन्हें संसार के अनेकानेक विद्वानों ने कहे और लिखे हैं, जो जीवन उपयोगी हैं। इन अनमोल वचनों को हम अपने जीवन में अपनाकर अपने जीवन में नई उंमग एवं उत्साह का संचार कर सकते हैं। अनमोल वचन को हम सूक्ति (सु + उक्ति) या सुभाषित (सु + भाषित) भी कहते हैं। जिसका अर्थ है “सुन्दर भाषा में कहा गया”। इन बातों को अनमोल इसलिए भी कहा जाता हैं क्योंकि यदि हम इन बातों का अर्थ या सार समझेगें, तो हम पायेंगे की इन बातों का कोई मोल नहीं लगा सकता। इन बातों को हम अपने जीवन में अपनाकर अपने जीवन की दिशा को बदल सकते हैं और जीवन की दिशा बदलनें वाली बातों का कभी कोई मोल नहीं लगा सकता हैं क्योकि ये बातें तो अनमोल होती हैं।
    वक्ता हो या संत हो, विद्वान् हो या लेखक हो, राजनेता हो या फिर कोई प्रशासक — अपनी बात कहने के साथ-साथ वह उसे सार-रूप में कहता हुआ एक माला के रूप में पिरोता चलता है। इस सार-रूप में कहे गए वाक्यों में ऐसे सूत्र छिपे रहते हैं, जिन पर चिंतन करने से विचारों की एक व्यवस्थित शृंखला का सहज रूप से निर्माण होता है। उस समय ऐसा लगता है मानो किसी विशिष्ट विषय पर लिखी गई पुस्तक के पन्ने एक-एक करके पलट रहे हों।
    सूत्ररूप में कहे गए ये कथन आत्मविकास के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। इसीलिए व्यक्तित्व विकास पर कार्य कर रहे अनुसंधानकर्ताओं और विद्वानों का कहना है कि प्रत्येक आत्मविकास के इच्छुक को चाहिए कि वह अपने लिए आदर्शवाक्य चुनकर उसे ऐसे स्थान पर रख या चिपका ले, जहाँ उसकी नज़र ज़्यादातर पड़ती हो। ऐसा करने से वह विचार अवचेतन में बैठकर उसके व्यक्तित्व को गहराई तक प्रभावित करेगा। इन वाक्यों का आपसी बातचीत में, भाषण आदि में प्रयोग करके आप अपने पक्ष को पुष्ट करते हैं। ऐसा करने से आपकी बातों में वजन तो आता ही है लोगों के बीच आपकी साख भी बढ़ती है।

Blockquote-open.gif सुभाषितों की पुस्तक कभी पूरी नहीं हो सकती। Blockquote-close.gif
- राबर्ट हेमिल्टन

    लोग जीवन में कर्म को महत्त्व देते हैं, विचार को नहीं। ऐसा सोचने वाले शायद यह नहीं जानते कि विचारों का ही स्थूल रूप होता है कर्म अर्थात् किसी भी कर्म का चेतन-अचेतन रूप से विचार ही कारण होता है। जानाति, इच्छति, यतते—जानता है (विचार करता है), इच्छा करता है फिर प्रयत्न करता है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसे आधुनिक मनोविज्ञान भी स्वीकार करता है। जानना और इच्छा करना विचार के ही पहलू हैं । आपने यह भी सुना होगा कि विचारों का ही विस्तार है आपका अतीत, वर्तमान और भविष्य। दूसरे शब्दों में, आज आप जो भी हैं, अपने विचारों के परिमामस्वरूप ही हैं और भविष्य का निर्धारण आपके वर्तमान विचार ही करेंगे। तो फिर उज्ज्वल भविष्य की आकांक्षा करने वाले आप शुभ-विचारों से आपने दिलो-दिमाग को पूरित क्यों नहीं करते।
    शब्द ब्रह्म है। भारतीय दर्शकों में शब्द को उत्तम प्रमाण माना गया है। इस संदर्भ में एक अत्यंत प्रचलित कथा का उल्लेख करना यहां युक्तिसंगत होगा। कथा इस प्रकार है — दस व्यक्तियों ने बरसाती नदी पार की। पार पहुँचने पर यह जांचने के लिए कि दसों ने नदी पार कर ली है, कोई नदी में डूब तो नहीं गया, एक ने गिनना शुरू किया। उसके अनुसार उनका एक साथी नदी में बह गया था। एक-एक करके सभी ने गिनती की, प्रत्येक का यही मानना था कि कोई बह गया है। सभी उस दसवें व्यक्ति के लिए रोने और विलाप करने लगे। वहाँ से गुज़र रहे एक बुद्धिमान व्यक्ति ने जब उनसे रोने तथा विलाप करने का कारण पूछा, तो उन्होंने सारी बात कह सुनाई। उस व्यक्ति ने उनको एक पंक्ति में खड़ा होने को कहा। जब सब पंक्ति में खड़े हो गए, तब उनमें से एक को बुलाकर उससे गिनने को कहा। उस व्यक्ति ने नौ तक गिनती गिनी और चुप हो गया। तब आगन्तुक ने कहा दसवें तुम हो’ इतना सुनते ही सारा रोना-विलाप करना अपने आप, बिना किसी प्रयास के समाप्त हो गया। आगंतुक ने क्या किया ? उसके शब्दों ने ही रोने-बिलखने को विदाई दिलवा दी।
    शंकराचार्य से जब उनके शिष्यों ने पूछा कि इस संसार - चक्र से मुक्त होने का क्या उपाय है, तो उनका जवाब था - केवल विचार ही। इसीलिए प्रत्येक धर्म-संप्रदाय और जाति के महान् पुरुषों ने सुझाव दिया कि जिस दिशा में आप अपने व्यक्तित्व को विकसित करना चाहते हैं, उससे संबंधित विचार को आप किसी ऐसी जगह रखे या चिपकाएं, जहां आपकी नज़र बार-बार जाती हो। वाक्य का अर्थ आपके भीतर बूस्टर की सी प्रतिक्रिया करेगा। श्रीमद्भागवद्ग गीता में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा कि मनुष्य को स्वयं से स्वयं का उद्धार करना होगा। कोई किसी की अवनति के लिए न तो उत्तरदायी है, न ही कोई किसी की उन्नति में अवरोध पैदा कर सकता है। मंथरा ने कैकेयी में परिवर्तन कैसे किया ? कैसे वह राम के राजा बनने में विरोधी बन गई ? कैसे उसने अपने पति दशरथ की मृत्यु और अपने वैधव्य की परवाह नहीं की ? इन सभी सवालों का जवाब आपको विचारों के परिवर्तन के इर्द-गिर्द ही घूमता मिलेगा।
    महापुरुषों के वाक्यों को पढ़ते समय उनके व्यक्तित्व की गरिमा भी आपको प्रभावित करती है, जिससे अचेतन मन वैसा करने या न करने को विवश हो जाता है। इस प्रकार की बेबसी की स्थिति व्यक्तित्व के विकास के लिए अनुकूल वातावरण पैदा करती है, क्योंकि तब आपके मन के पास मनमानी करने का न तो अवसर होता है, न ही सामर्थ्य। अनुभव में एक बात और आई है कि कभी - कभी आपकी ऐसी शंका का समाधान एक छोटा-सा वाक्य कर जाता है, जिसके लिए आप लंबे समय से भटक रहे होते हैं। ‘देखन में छोटे लगें, घाव करें गंभीर’ वाली इन वाक्यों के साथ लागू होती है। बातचीत करते समय, भाषण देते समय, बहस करते वक़्त या लिखते समय जब आप इन वाक्यों द्वारा अपने कथन की पुष्टि करते हैं तो आपकी बात में वजन आ जाता है, आपके व्यक्तित्व को प्रभावशाली बनाने में इनसे सहायता मिलती है।
    हमें विश्वास है कि यह संकलन आपके व्यक्तित्व को विकसित कर आपके जीवन में नई स्फूर्ति का संचार करते हुए आपमें आत्मविश्वास पैदा करेगा कि आपसे श्रेष्ठ कोई नहीं है और कौन-सा काम ऐसा है, जिसे आप नहीं कर सकते।

    Seealso.jpg इन्हें भी देखें: कहावत लोकोक्ति मुहावरे, सूक्ति और कहावत, अनमोल वचन 2, अनमोल वचन 3, अनमोल वचन 4, अनमोल वचन 5, अनमोल वचन 6, अनमोल वचन 7, अनमोल वचन 8 एवं महात्मा गाँधी के अनमोल वचन

अनमोल वचन संग्रह
अनमोल वचन

तीन बातें

    तीन बातें कभी न भूलें - प्रतिज्ञा करके, क़र्ज़ लेकर और विश्वास देकर। - महावीर
    तीन बातें करो - उत्तम के साथ संगीत, विद्वान् के साथ वार्तालाप और सहृदय के साथ मैत्री। - विनोबा
    तीन अनमोल वचन - धन गया तो कुछ नहीं गया, स्वास्थ्य गया तो कुछ गया और चरित्र गया तो सब गया। - अंग्रेजी कहावत
    तीन से घृणा न करो - रोगी से, दुखी से और निम्न जाती से। - मुहम्मद साहब
    तीन के आंसू पवित्र होते हैं - प्रेम के, करुना के और सहानुभूति के। - बुद्ध
    तीन बातें सुखी जीवन के लिए- अतीत की चिंता मत करो, भविष्य का विश्वास न करो और वर्तमान को व्यर्थ मत जाने दो।
    तीन चीज़ें किसी का इन्तजार नहीं करती - समय, मौत, ग्राहक।
    तीन चीज़ें जीवन में एक बार मिलती है - मां, बांप, और जवानी।
    तीन चीज़ें पर्दे योग्य है - धन, स्त्री और भोजन।
    तीन चीजों से सदा सावधान रहिए - बुरी संगत, परस्त्री और निन्दा।
    तीन चीजों में मन लगाने से उन्नति होती है - ईश्वर, परिश्रम और विद्या।
    तीन चीजों को कभी छोटी ना समझे - बीमारी, कर्जा, शत्रु।
    तीनों चीजों को हमेशा वश में रखो - मन, काम और लोभ।
    तीन चीज़ें निकलने पर वापिस नहीं आती - तीर कमान से, बात जुबान से और प्राण शरीर से।
    तीन चीज़ें कमज़ोर बना देती है - बदचलनी, क्रोध और लालच।
    तीन चीज़े असल उद्धेश्य से रोकता हैं - बदचलनी, क्रोध और लालच।
    तीन चीज़ें कोई चुरा नहीं सकता - अकल, चरित्र, हुनर।
    तीन व्यक्ति वक़्त पर पहचाने जाते हैं - स्त्री, भाई, दोस्त।
    तीनों व्यक्ति का सम्मान करो - माता, पिता और गुरु।
    तीनों व्यक्ति पर सदा दया करो - बालक, भूखे और पागल।
    तीन चीज़े कभी नहीं भूलनी चाहिए - कर्ज़, मर्ज़ और फर्ज़।
    तीन बातें कभी मत भूलें - उपकार, उपदेश और उदारता।
    तीन चीज़े याद रखना ज़रुरी हैं - सच्चाई, कर्तव्य और मृत्यु।
    तीन बातें चरित्र को गिरा देती हैं - चोरी, निंदा और झूठ।
    तीन चीज़ें हमेशा दिल में रखनी चाहिए - नम्रता, दया और माफ़ी।
    तीन चीज़ों पर कब्ज़ा करो - ज़बान, आदत और गुस्सा।
    तीन चीज़ों से दूर भागो - आलस्य, खुशामद और बकवास।
    तीन चीज़ों के लिए मर मिटो - धेर्य, देश और मित्र।
    तीन चीज़ें इंसान की अपनी होती हैं - रूप, भाग्य और स्वभाव।
    तीन चीजों पर अभिमान मत करो – ताकत, सुन्दरता, यौवन।
    तीन चीज़ें अगर चली गयी तो कभी वापस नहीं आती - समय, शब्द और अवसर।
    तीन चीज़ें इन्सान कभी नहीं खो सकता - शान्ति, आशा और ईमानदारी।
    तीन चीज़ें जो सबसे अमूल्य है - प्यार, आत्मविश्वास और सच्चा मित्र।
    तीन चीजे जो कभी निश्चित नहीं होती - सपनें, सफलता और भाग्य।
    तीन चीजें, जो जीवन को संवारती है - कड़ी मेहनत, निष्ठा और त्याग।
    तीन चीज़ें किसी भी इन्सान को बरबाद कर सकती है - शराब, घमन्ड और क्रोध।
    तीन चीजों से बचने की कोशिश करनी चाहिये – बुरी संगत, स्वार्थ और निन्दा।
    कोई भी कार्य करने से पहले – सोचो, समझो, फिर करो।

सोमवार, २५ सप्टेंबर, २०१७

योग्यता (सूक्तियाँ)

योग्यता (सूक्तियाँ)
क्रमांक सूक्तियाँ सूक्ति कर्ता
(1) केवल बुद्धि के द्वारा ही मानव का मनुष्यत्व प्रकट होता है। प्रेमचंद
(2) कार्यकुशल व्यक्ति की सभी जगह जरुरत पड़ती है। प्रेमचंद
(3) गुण छोटे लोगों में द्वेष और महान् व्यक्तियों में स्पर्धा पैदा करता है। फील्डिंग
(4) कार्यकुशल व्यक्ति के लिए यश और धन की कमी नहीं है। अज्ञात
(5) मनुष्य अपने गुणों से आगे बढता है न कि दूसरों कि कृपा से। लाला लाजपतराय
(6) यदि तुम अपने आपको योग्य बना लो, तो सहायता स्वयमेव तुम्हे आ मिलेगी। स्वामी रामतीर्थ
(7) महान व्यक्ति न किसी का अपमान करता है ओर न उसको सहता है। होम
(8) नैतिक बल के द्वारा ही मनुष्य दूसरों पर अधिकार कर सकता है। स्वामी रामदास
(9) मनुष्य धन अथवा कुल से नहीं, दिव्य स्वभाव और भव्य आचरण से महान् बनता है। आविद
(10) ज्ञानी वह है, जो वर्तमान को ठीक प्रकार समझे और परिस्थिति के अनुसार आचरण करे। विनोबा भावे
(11) शिक्षा जीवन की परिस्थितियों का सामना करने की योग्यता का नाम है। जॉन जी. हिबन
(12) इच्छा हमेशा योग्यता को हरा देती है।
(13) यदि अवसर का लाभ न उठाया जाए, तो योग्यता का कोई मूल्य नहीं होता है।
(14) सफलता के तीन रहस्य हैं - योग्यता, साहस और कोशिश।
(15) योग्यता से बिताए हुए जीवन को,हमें वर्षों से नहीं बल्कि कर्मों के पैमाने से तौलना चाहिए। शेरिडेन
(16) जो लोग अपनी प्रशंसा के भूखे होते हैं, वे साबित करते हैं कि उनमें योग्यता नहीं है। महात्मा गांधी
(17) लगन और योग्यता एक साथ मिलें तो निश्चय ही एक अद्वितीय रचना का जन्म होता है। मुक्ता
(18) चाहे आप में कितनी भी योग्यता क्यों न हो, केवल एकाग्रचित्त होकर ही आप महान् कार्य कर सकते हैं। बिल गेट्स
(19) कोई भी व्यक्ति जो सुंदरता को देखने की योग्यता को बनाए रखता है, वह कभी भी वृद्ध नहीं होता है। फ्रेंक काफ्का
(20) धन उत्तम कर्मों से उत्पन्न होता है, योग्यता, साहस तथा दृढ़ निश्चय से फलता - फूलता है और संयम से सुरक्षित होता है। विदुर
(21) अच्छी नसीहत मानना अपनी योग्यता बढ़ाना है। सोलन
(22) योग्यता एक चौथाई व्यक्तित्व का निर्माण करती है। शेष की पूर्ति प्रतिष्ठा के द्वारा होती है। मोहन राकेश
(23) उच्च और निम्न की योग्यता का विचार वस्त्र देख कर भी होता है। समुद्र ने विष्णु को पीताम्बरधारी देख कर अपनी कन्या दे दी तथा शिव को दिगम्बर देख कर विष दिया। अज्ञात
(24) लोग अक्सर कहते हैं कि मैं भाग्यशाली हूँ। लेकिन भाग्य केवल उचित समय पर अपनी प्रतिभा को दिखाने का मौक़ा मिलने तक ही महत्व रखता है। उसके बाद आप को प्रतिभा और प्रतिभा को काम में ला पाने की योग्यता की आवश्यकता होती है। फ्रैंक सिनात्रा

शनिवार, २३ सप्टेंबर, २०१७

300 अनमोल सुविचार

 सुविचार
300 अनमोल सुविचार

१) सुरुवात कशी झाली यावर बऱ्याच घटनांचा शेवट अवलंबून असतो.
२) आयुष्यात भावनेपेक्षा कर्तव्य मोठे असते.
३) प्रार्थना म्हणजे मनाचं स्थान
४) जग प्रेमाने जिंकता येतं; शत्रुत्वाने नाही.
५) यश मिळवायचं असेल तर स्वत:च स्वत:वर काही बंधन घाला.
६) प्रत्येकाच्या मनात एक आदर्श व्यक्ती असलीच पाहिजे.
७) ज्याने स्वत:चं मन जिंकलं त्याने जग जिंकलं.
८) यश मिळवण्यासाठी सगळ्यात मोठी शक्ती-आत्मविश्वास.
९) प्रतिकूलतेतही अनुकूलता निर्माण करतो तोच खरा माणूस !
१०) चुकतो तो माणूस आणि चुका सुधारतो तो देवमाणूस !
११) मित्र परिसासारखे असावेत म्हणजे आयुष्याचं सोनं होतं.
१२) छंद आपल्याला आयुष्यावर प्रेम करायला शिकवतात.
१३) आपण जे पेरतो तेच उगवतं.
१४) फ़ळाची अपेक्षा करुन सत्कर्म कधीच करु नये.
१५) उशीरा दिलेला न्याय हा न दिलेल्या न्यायासारखा असतो.
१६) शरीराला आकार देणारा कुंभार म्हणजे व्यायाम.
१७) प्रेम सर्वांवर करा पण श्रध्दा फ़क्त परमेश्वरावरच ठेवा.
१८) आधी विचार करा; मग कृती करा.
१९) आयुष्यत आई आणि वडील यांना कधीच विसरु नका,
२०) फ़क्त स्वत:साठी जगलास तर मेलास आणि स्वत:साठी जगून दुसऱ्यांसाठी जगलास तर जगलास !
२१) एकमेकांची प्रगती साधते ती खरी मैत्री.
२२) अतिथी देवो भव ॥
२३) अपयशाने खचू नका; अधिक जिद्दी व्हा.
२४) दु:ख कवटाळत बसू नका; ते विसरा आणि सदैव हसत रहा.
२५) आपल्यामुळे दुसऱ्याला दु:ख होईल असे कधीही वागू नका.
२६) निघून गेलेला क्षण कधीच परत आणता येत नाही.
२७) खऱ्या विद्यार्थ्याला कधीच सुट्टी नसते. सुट्टी ही त्याच्यासाठी नवं काहीतरी शिकण्याची संधी  असते.
२८) उद्याचं काम आज करा आणि आजचं काम आत्ताच करा.
२९) चुकीचा व्यवहार माणसं तोडतो म्हणून तो सत्याने आणि सन्मानाने करा.
३०) नवं काहीतरी शिकण्यासाठी मिळालेला वेळ म्हणजे सुट्टी.
३१) माणसाची चौथी मूलभूत गरज म्हण्जे पुस्तक.
३२) सत्याने मिळतं तेच टिकतं.
३३) जो दुसऱ्यांना देतो त्याला देव देतो.
३४) परमेश्वराच्या आशीर्वादाशिवाय कुठलेही कार्य सिध्दीस जात नाही.
३५) हिंसा हे जगातलं सगळ्यात मोठं पाप आहे; मग ती एखाद्या माणसाची असो वा पशुची !
३६) स्वप्न आणि सत्य यात साक्षात परमेश्वर उभा असतो.
३७) प्राप्तीपेक्षा प्रयत्नांचा आनंद अधिक असतो.
३८) खरी श्रीमंती शरीराची, बुध्दीची आणि मनाची
३९) तडजोड हे आयुष्याचं दुसरं नाव आहे.
४०) वाहतो तो झरा आणि थांबते ते डबकं ! डबक्यावर डास येतात आणि झऱ्यावर राजहंस !!
४१) जो गुरुला वंदन करत नाही; त्याला आभाळाची उंची लाभत नाही.
४२) गर्वाचं घर नेहमीच खाली असतं.
४३) झाडावर प्रेम करणारा माणूस सदैव प्रसन्नच असतो.
४४) माणसाचा सगळ्यात मोठा सदगुण म्हणजे त्याची माणुसकी
४५) क्रांती हळूहळू घडते; एका क्षणात नाही.
४६) सहल म्हणजे माणसिक आनंदाची सामुहिक क्रिडा
४७) मुक्या प्राण्यांवर सदैव प्रेम करा.
४८) आयुष्याच्या प्रवासात प्रवास अत्यावश्यक आहे.
४९) बाह्यसौंदर्यापेक्षा अंतर्गत सौंदर्य जास्त मोलाचं असतं.
५०) मनाची श्रीमंती ही कुठल्याही श्रीमंतीपेक्षा मोठी असते.
५१) तुम्ही आयुष्यात किती माणसे जोडली यावरुन तुमची श्रीमंती कळते.
५२) शिक्षक म्हणजे विद्यार्थ्याचा दुसरा पालकच.
५३) मनाचे दरवाजे नेहमी खुले ठेवा; ज्ञानाचा प्रकाश कुठुन कधी येईल सांगता येत नाही.
५४) आपल्याला मदत करणाऱ्या माणसांशी नेहमी कृतज्ञ रहा.
५५) एखाद्याला गुन्हेगार ठरविताना त्याच्या जागी स्वत:ला ठेवून बघा.
५६) परीक्षा म्हणजे स्वत:च्या आत डोकावून पाहण्याची संधी !
५७) खिडकी म्हणजे आकाश नसतं.
५८) जगण्यात मौज आहेच पण त्याहून अधिक मौज फ़ुलण्यात आहे
५९) वाचन, मनन आणि लेखन म्हणजे अध्ययन.
६०) भाकरी आपल्याला जगवते आणि गुलाबाचं फ़ूल कशासाठी जगायचं हे शिकवते.
६१) कविता म्हणजे भावनांचं चित्र!
६२) संभ्रमाच्या वेळी नेहमी आपल्या कर्तव्याला प्राधान्य द्या.
६३) तुम्ही जेवढं इतरांना द्याल तेवढंच, किंबहुना त्याच्या कित्येक पटीने देव तुम्हाला देईल.
६४) ज्याच्यामधे मानवता आहे तोच खरा मानव !
६५) स्वत:च्या स्वार्थासाठी दुसऱ्याचा वापर कधी करु नका; आणि स्वत:चा वापर कुणाला करु देऊ नका.
६६) अनुभवासारखा दुसरा गुरू नाही.

६७) तुलना करावी पण अवहेलना करू नये.
६८) समाधानी राहण्यातच आयुष्यातलं सगळ्यात मोठं सुख आहे.
६९) आयुष्यातल्या कोणत्याही क्षणी क्रोधाचे गुलाम बनू नका.
७०) मनात आणलं तर या जगात अश्यक्य असं काहीच नाही.
७१) चेहरा हा आपल्या व्यक्तीमत्त्वाचा आरसा असतो.
७२) व्यर्थ गोंष्टींची कारणे शोधू नका; आहे तो परिणाम स्वीकारा.
७३) आवडतं तेच करू नका; जे करावं लागतं त्यात आवड निर्माण करा.
७४) तुम्ही किती जगलात ह्यापेक्षा कसं जगलात याला जास्त महत्त्व आहे.
७५) अश्रु येणं हे माणसाला ह्रदय असल्याचं द्योतक आहे.
७६) विचारवंत होण्यापेक्षा आचारवंत व्हा.
७७) मरण हे अपरिहार्य आहे त्याला भिऊ नका.
७८) आयुष्यात प्रेम कारा ; पण प्रेमाचं प्रदर्शन करू नका.
७९) आयुष्यात कुठलीच नाती ठरवून जोडता येत नाही.
८० प्रायश्चित्तासारखी दूसरी शिक्षा नाही.
८१) तुम्ही जिथे जाल तिथे तुमची गरज निर्माण करा.
८२) सगळेच निर्णय मनाने घेऊ नका; काही निर्णय बुध्दीलाही घेऊ द्या.
८३) काळ्याकुट्ट रात्रीनंतर सुर्य उगवतोचं.
८४) लखलखते तारे पाहण्यासाठी आपल्याला अंधारातच राहवं लागतं.
८५) चांगली कविता माणसाला संवेदनाक्षम बनवते.
८६) तुमची उक्ती आणि कृती यात भेद ठेवू नका.
८७) भुतकाळ आपल्याला आठवणींचा आनंद देतो; भविष्यकाळ आपल्याला स्वप्नांचा आनंद देतो पण आयुष्याचा आनंद फ़क्त वर्तमानकाळच देतो.
८८) चांगला माणूस घडवणे हेच शिक्षणाचे खरे ध्येय आहे.
८९) आयुष्यात सर्वात जास्त विश्वास परमेश्वरावर ठेवा.
९०) उलटा केलेला पिरॅमिड कधीच उभा राहू शकत नाही
९१) पोहरा झुकल्याशिवाय विहिरीतलं पाणी पोहऱ्यात जात नाही.
९२) अत्तर सुगंधी व्हायला फ़ुले सुगंधी असावी लागतात.
९३) मित्राच्या मृत्यूपेक्षा मैत्रीचा मृत्यू अधिक दुःखदायक असतो.
९४) रागाला जिकंण्याचा एकमेव उपाय - मौन !
९५) अती अशा हे दुःखाचं मूळ कारण आहे.
९६) अंथरूण बघून पाय पसरा.
९७) कधी कधी हक्क मागून मिळत नाहीत; ते मिळवावे लागतात.
९८) तुम्हाला ज्या विषयाची माहिती आहे त्याविषयी कमी बोला, आणि ज्या विषयाची माहिती नाही त्या विषयी मौन पाळा.
९९) अतिशहाणा त्याचा बैल रिकामा.
१००) संकटं तुमच्यातली शक्ती, जिद्द पाहण्यासाठीच येत आसताच.
१०१) सन्मित्र शिंपल्यातल्या मोत्यासारखे असतात.
१०२) सौंदर्य हे वस्तूत नसते; पाहणाऱ्याच्या दृष्टीत असते.
१०३) शरीरमाध्यम खलु सर्वसाधनम ॥
१०४) सर्वच प्रश्न सोडवून सूटत नाहीत; काही सोडून दिले की आपोआप सुटतात.
१०५) विद्या विनयेन शोभते ॥
१०६) शीलाशिवाय विद्या फ़ुकाची आहे.
१०७) जगाशी प्रामाणिक राहण्यापेक्षा आधी स्वतःशी प्रामाणिक रहा.
१०८) एकदा तुटलेलं पान झाडाला परत कधीच जोडता येत नाही.
१०९) कामात आनंद निर्माण केला की त्याचं ओझं वाटत नाही.
११०) आयुष्यात खरं प्रेम, खरी माया फ़ार दूर्मिळ असते.
१११) ज्या चांगल्या बाबी आपण निर्माण केल्या नाहीत त्या नष्ट करण्याचा आधिकार आपल्याला नाही.
११२) कुणीही चोरू शकत नाही अशी संपत्ती कमावण्याचा प्रयत्न करा.
११३) देणाऱ्याने देत जावे, घेणाऱ्याने घेत जावे घेता घेता एक दिवस, देणाऱ्याचे हात घ्यावे !
११४) आयुष्यात सगळ्याच गोष्टी आपल्याला जमतील असं नाही.
११५) मूर्खांना विवेक सागंणे हाही मूर्खपणाच !
११६) ज्या गोष्टींशी आपला काहीही संबंध नाही त्यात नाक खुपसले की तोटाच होतो.
११७) जे झालं त्याचा विचार करू नका; जे होणार आहे त्याचा विचार करा.
११८) आपल्याला जे आवडतात त्यांच्यावर प्रेम करण्यापेक्षा ज्यानां आपण आवडतो त्यांच्यावर प्रेम करा.
११९) रामप्रहरी जागा होतो त्यालाच प्रहरातला राम भेटतो.
१२०) जे आपले आहेत त्यांच्यावर कुणीही प्रेम करतं; पण जे आपले नाहीत त्यांच्यावर प्रेम करणं हेच खरं प्रेम !
१२१) लक्षात ठेवा-आयुष्यात कुठलीच गोष्ट कायमची आपली नसते.
१२२) कधी कधी आपण ज्यांच्यावर खूप प्रेम करतो तीच माणसं आपल्यापासून फार दूर जातात.
१२३) जे आपले नाही त्याच्यावर कधीच हक्क सांगू नका.
१२४) पुढचा आपल्याशी चांगला वागेल या अपेक्षेने त्याच्याशी चांगलं वागू नका.
१२५) आयुष्यात भेटणारी सगळीच माणसे सारखी नसतात.
१२६) गुणांचं कौतुक उशीरा होतं; पण होतं !
१२७) कुठल्याही कामाला अंतःकरणाचा उमाळा लागतो.
१२८) स्वतःचा अवगुण शोधणं हीच गुणांची पूर्तता !
१२९) ज्यादिवशी आपली थोडीही प्रगती झाली नाही तो दिवस फुकट गेला अस समजा.
१३०) जो स्वतःवर प्रेम करू शकत नाही तो जगावर काय प्रेम करणार !
१३१) सृजनातला आनंद कल्पनेच्या पलीकडचा असतो.
१३२) श्रध्दा असली की सृष्टीतल्या प्रत्येक गोष्टीत देव दिसतो.
१३३) आनंदी मन, सुदृढ शरीर आणि अध्यात्मिक श्रध्दा ह्या तिनही गोष्टी लाभणं म्हणजे अमृत मिळणं.
१३४) एकांतात मिळणाऱ्या क्षणांचं आपण काय करतो यावर आयुष्याकडे पाहाण्याचा आपला दृष्टीकोन व्यक़्त होतो.
१३५) प्रेमाला आणि द्वेषालाही प्रेमानेच जिंका.
१३६) आपण चुकतो तिथे सावरतो तोच खरा मित्र !
१३७) आपला जन्म होतो तेव्हा आपण रडत असतो आणि लोक हसत असतात. मरताना आपण असं मरावं की आपण हसत असू आणि लोक रडत असतील !
१३८) स्वतःची चूक स्वतःला कळली की बरेच अनर्थ टळतात.
१३९) अश्रुंनीच ह्र्दये कळतात आणि जुळतात.
१४०) हक्क आणि कर्तव्य या एकाच नाण्याच्या दोन बाजू आहेत.
१४१) आयुष्यात असं काहीतरी मिळवा जे तुमच्या पासून कुणीही चोरून घेऊ शकत नाही.
१४२) बदलण्याची संधी नेहमी असते पण बदलण्यासाठी तूम्ही वेळ काढला का ?
१४३) कलेशिवाय जीवन म्हणजे सुगंधाशिवाय फूल आणि प्राणाशिवाय शरीर !
१४४) टाकीचे घाव सोसल्याशिवाय देवपण मिळत नाही.
१४५) नेहमी तत्पर रहा; बेसावध आयुष्य जगू नका.
१४६) यश न मिळणे याचा अर्थ अपयशी होणे असा नाही.
१४७) आयुष्यात खूपदा बुध्दी जिंकते; ह्रदय हरतं पण बुध्दी जिंकूनही हरलेली असते आणि ह्रदय हरूनदेखील जिंकलेलं असतं.
१४८) खरं आणि खोटं यात केवळ चार बोटांचं अंतर आहे. आपण कानांनी ऎकतो ते खोटं आणि डोळ्यांनी पाहतो ते खरं.
१४९) जगी सर्व सुखी असा कोन आहे; विचारी मना तुच शोधूनी पाहे.
१५०) प्रत्येक बाबतीत दुसऱ्याच अनुकरण करु नका; स्वतःची वेगळी ओळख निर्माण करा.
१५१) स्वातंत्र्य म्हणजे संयम; स्वैराचार नव्हे.
१५२) आयुष्यातला खरा आंनद भावनेच्या ओलाव्यात असतो.
१५३) माणसाने आपल्या आयुष्यात सुख-दुःख मानापमान, स्फूर्ती-निंदा, लाभ हानी, प्रिय-अप्रिय ह्या गोष्टी समान समजाव्यात.
१५४) जीवनातील प्रत्येक क्षणी शिकणं म्हणजे शिक्षण.
१५५) तन्मयता नसेल तर; विद्वत्ता व्यर्थ आहे.
१५६) शिक्षण हे साधन आहे; साध्य नव्हे.
१५७) हसा, खेळा पण शिस्त पाळा.
१५८) आयुष्यात काय गमावलंत ह्यापेक्षा काय कमावलंत ह्याचा विचार करा.
१५९) स्वतः जगा आणि दुसऱ्यालाही जगू द्या.
१६०) तूच आहेस तूझ्या जीवनाचा शिल्पकार !
१६१) काळ्याकुट्ट रात्रीनंतर उद्याची लख्ख पहाट असतेच.
१६२) काळजाची प्रत्येक जखम भरून येते कारण काळ दुःखावर मायेची फुंकर घालत असतो.
१६३) एक साधा विचारसुध्दा तुमचं आयुष्य उजळवू शकतो म्हणून नेहमी नवे विचार मिळवत रहा.
१६४) हे देवा, मला खूप खूप आव्हानं दे व ती पेलण्यासाठी प्रचंड शक्ती दे !
१६५) उगवणारा प्रत्येक दिवस उमलणारा हवा.
१६६) या जन्मावर, या जगण्यावर शतदा प्रेम करावे.
१६७) तुम्हाला मोठेपणी कोणं व्हायचंय ते आजच ठरवा....आत्ताच !
१६८) केल्याने होत आहे रे आधी केलेची पाहीजे.
१६९) दुसऱ्यांच्या गुणाचं कौतुक करायलाही मन मोठं लागतं.
१७०) माणूस म्हणजे गुण व दोष यांचे मिश्रण आहे.
१७१) प्रत्येक क्षण अपल्याला काही ना काही शिकवत असतो.
१७२) व्यायामामुळे बुध्दी आणि मन दोहोंचे सामर्थ्य प्रभावी होते.
१७३) काट्याविना गुलाबाचा कोमलपणा व्यर्थ असतो.
१७४) दुःख हे कधीच दागिन्यासारखं मिरवू नका; वाटू शकलात तर आपला आनंद वाटा.
१७५) शक्तीचा उपयोग नेहमी शहाणपणाने करा. क्रोधाच्या मार्गाने ती वाया घालवू नका.
१७६) जग भित्र्याला घाबरवते आणि घाबरवणाऱ्याला घाबरते.
१७७) दुःख हे बैलालासुध्दा कोकिळेसारखं गायला लावतं.
१७८) शिकणाऱ्याला शिकवावं लागत नाही; तो स्वतःहून शिकतो.
१७९) जग हे कायद्याच्या भीतीने चालत नाही ते सद्विचाराने चालते.
१८०) परिस्थितिला शरण न जाता परिस्थितीवर मात करा.
१८१) ऎकावे जनाचे करावे मनाचे.
१८२) एका वेळी एकच काम आणि तेही एकाग्रतेने करा.
१८३) केवळ ज्ञान असून उपयोग नाही, ते कसं आणि केव्हा वापरायचं याचंही ज्ञान हवं.
१८४) बाह्यशत्रूपेक्षा बऱ्याच वेळी अंतःशत्रूचीच अधीक भीती असते.
१८५) चिंता ही कुठल्याच दुःखावरचा उपाय होऊ शकत नाही.
१८६) तलवारीच्या जोरावर मिळवलेलं राज्य तलवार असेतोवरच टिकतं.
१८७) दुःखातील दुःखिताला सुख म्हणजे त्याच्या दुःखातला सहभाग होय.
१८८) स्वातंत्र्य हा आपला जन्मसिध्द हक्क आहे पण त्याचा स्वैराचार होऊ न देणं हे आपलं आद्यकर्तव्य आहे.
१८९) स्वतःला पुर्ण ज्ञानी समजणाऱ्याचा विकास खुंटला.
१९०) त्रासाशिवाय विद्या मिळणे अशक्य आहे. नव्हे, त्रास कसा सहन करायचा हे शिकणे हीच विद्या !
१९१) जगू शकलात तर चंदनासारखे जगा; स्वत: झीजा आणि इतरांना गंध द्या
१९२) दुबळी माणसे रडगाणी सांगण्यासाठीच जन्माला आलेली असतात.
१९३) पाप ही अशी गोष्ट आहे जी लपवली की वाढत जाते.
१९४) उद्याचा भविष्यकाळ वर्तमानाच्या त्यागातून निर्माण होत असतो.
१९५) जो चांगल्या वॄक्षाचा आधार घेतो त्याला चांगलीच सावली लाभते.
१९६) मरावे परी कीर्तीरूपे उरावे.
१९७) आयुष्य जगून समजते; केवळ ऎकून , वाचून , बघून समजत नाही.
१९८) मूर्ख माणसे आपापसात संभाषण करू लागली की शहाण्या माणसाने मौन धारण करणे योग्य.
१९९) बचत म्हणजे काय आणि ती कशी करावी हे मधमाश्यांकडून शिकावं.
२००) तारूण्य म्हणजे जीवनाचा रचनाकाळ आहे.
 २०१) गरिबी असूनही दान करतो तो ख्ररा दानशूर.
२०२) स्वार्थरहीत आणि खरीखुरी सेवा हीच खरी प्रार्थना.
२०३) प्रार्थना म्हणजे ईश्वराच्या जवळ जाण्याची शक्ती.
२०४) आपले सौख्य हे आपल्या विचारांवर अवलंबून असते.
२०५) जे घाईघाईने वर चढू पाहतात ते कोसळतात.
२०६) सदगुणांना कधीच वार्धक्य येत नाही.
२०७) उषःकाल कितीही चांगला असला तरी सूर्याला तिथे फार काळ थांबता येत नसतं.
२०८) लज्जा हा सौंदर्याचा अलंकार आहे.
२०९) मोहाचा पहिला क्षण, ही पापाची पहिली पायरी असते.
२१०) जीवन नेहमीच अपूर्ण असते आणि ते अपूर्व असण्यातच त्याची गोडी साठवलेली असते.
२११) सत्याला शपथांच्या टेकूची गरज नसते.
२१२) जगात सारी सोंगे करता येतात, पण पैशाच सोंग करता येत नाही.
२१३) संकटं टाळणं माणसाच्या हाती नसतं पण संकटाचा सामना करणं त्याच्या हातात असतं.
२१४) जूनी खपली काढून बुजलेल्या जखमा ताज्या करण्यात शहाणपणा नसतो.
२१५) सौंदर्य, सुस्वभाव यांची बेरीज करा, मैत्रीतून मत्सर वजा करा, प्रेमाला शुध्द अंतःकरणाने गुणा, परमनिंदेचा लघुत्तम काढा, सुविचारांचा वर्ग करा, दया, क्षमा, शांती, परमार्थ यांचे समीकरण सोडवा... हेच आपल्या सुखी आयुष्याचे गणित आहे.
२१६) क्रांती तलवारीने घडत नाही; तत्वाने घडते.
२१७) जो गुरू असेल, तो शिष्य असेलच. जो शिष्य नसेल, तो गुरू नसेल.
२१८) जीवन हा एक पाण्याचा प्रवाह आहे, समुद्र गाठायचा असेल, तर खाचखळगे पार करावेच लागतील.
२१९) जीवन ही एक जबाबदारी आहे. क्षणाक्षणाला दुसऱ्याला सांभाळत न्यावं लागतं.
२२०) वैभव त्यागात असते, संचयात नाही.
२२१) तुम्हाला सज्जन व्हावेसे वाटत असेल तर आधी तुम्ही वाईट आहात यावर विश्वास ठेवा.
२२२) खोटी टीका करू नका, नाहीतर प्रतिटीका ऎकावी लागेल.
२२३) मनाविरूध्द गोष्ट, म्हणजे ह्रदयस्थ परमेश्वराविरूध्द.
२२४) पुस्तकांसारखा दुसरा मित्र नाही. आपले अंतरंग खुले करते. कधी चुकवत नाही की फसवत नाही.
२२५) ह्रदयात अपार प्रेम असंल की सर्वत्र मित्र
२२६) टीका करणाऱ्या शत्रुंपेक्षा दिखाऊ स्तुती करणाऱ्या मित्रांपासून सावध रहा.
२२७) प्रसंगी थोडे नुकसान झाले तरी चालेल, पण शत्रू निर्माण करू नका.
२२८) मनाला आंनद देण्याचा कोणत्याही पदार्थाचा गुण म्हणजेच सौंदर्य.
२२९) भव्य विचार हा सुगंधासारखा असतो; तो पसरावावा लागत नाही; आपोआप पसरतो.
२३०) वाईट गोष्टींशी असहकार दाखवणे हे मानवाचे आद्य कर्तव्य आहे.
२३१) त्याज्य वस्तू फूकट मिळाली तरी स्वीकारू नये.
२३२) शत्रूशीही प्रेमाने वागून त्याला जिंकता येते; पण त्यासाठी संयम असावा लागतो.
२३३) कृतघ्नतेसारखे दुसरे पाप नाही.
२३४) बनू शकलात तर कृतज्ञ बना, कृतघ्न नको.
१३५) दुसऱ्याचे अनूभव जाणून घेणे हाही एक अनुभवच आसतो.
२३६) ओरडण्याने ओरडणे बंद होत नाही; स्वस्थ राहण्याने मात्र होते.
२३७) दुःख गरूडाच्या पावलाने येतं आणि मुगींच्या पावलांनी जातं.
२३८) जीवन जगण्याची कला हीच सर्व कलांमध्ये श्रेष्ठ कला आहे.
२३९) एकमेका साहय्य करू । अवघे धरू सुपंथ ॥
२४०) सुख हे दुःखाचे मोल देऊनच मिळते.
२४१) श्रीमंताचे बंगले चांगले असतात पण म्हणून कोणी आपल्या झोपड्या पाडत नाही.
२४२) राष्ट्र निर्माण करायचे असेल तर आधी राष्ट्रनिष्ठा निर्माण करायला हवी.
२४३) संयम राखणे हा आयुष्यातला फार मोठा गुण आहे.
२४४) असंभवनीय गोष्टी कधीच खऱ्या मानू नयेत.
२४५) उषःकालाकडे जाण्याचा एकमेव मार्ग आहे, तो म्हणजे रात्र.
२४६) ज्या गोष्टी कधीच बदलू शकत नाहीत त्यांच्याविषयी कधीही दुःखी होऊ नये.
२४७) जे दुसऱ्याचे स्वातंत्र्य हिरावून घेतात, त्यांना स्वातंत्र्यात राहण्याचा हक्क नही.
२४८) पुस्तकाइतका प्रांजळ आणि निष्कपटी मित्र दुसरा मिळणार नाही.
२४९) मनाला आंनद, संस्कार देणारी प्रत्येक वस्तू व कृती कलापूर्ण आहे.
२५०) दोष लपवला की तो मोठा होतो आणि कबूल केला की नाहीसा होतो.
२५१) आकाशाखाली झोपणाऱ्याला कोण लुटणार ?
२५२) जखम करणारा विसरतो पण जखम ज्याला झाली तो विसरत नाही.
२५३) पिंजऱ्यात कोंडून पाखरं कधीच आपली होत नाहीत.
२५४) आपण परिस्थितीला शरण जाता कामा नये; परिस्थिती आपल्याला शरण गेली पाहिजे.
२५५) अंहकार हा तपःसाधनेचा महान शत्रू आहे.
२५६) मोती होण्यासाठी जलबिंदूला आकाशातून आपला अधःपात करून घ्यावा लागतो.
२५७) नैतिक पाया ढासळला की धार्मीकता संपलीच म्हणून समजा.
२५८) अंतर्बाह्य प्रांजळपणा हाच प्रीतीचा प्राण होय.
२५९) सामर्थ्याच्या पाठीमागे शील हवे.
२६०) शहाणपणाचे प्रदर्शन करणारा पोपट कायमचा बंदिवान होतो.
२६१) गवताची दोरी वळली म्हणजे तिने मत्त हत्तीसुध्दा बांधला जातो.
२६२) दुर्जन मंडळीत बसण्यापेक्षा एकटे बसणे बरे आणि एकटे बसण्यापेक्षा सज्जन मंडळीत बसणे हे त्याहून बरे.
२६३) पाप इतका सुंदर पोशाख घालून येते की ते पाप आहे असे माहीत असूनही आपण त्याला कवटाळतो.
२६४) पुढे मिळणाऱ्या आनंदाच्या कल्पनेने जे सुख मिळते; त्या सुखाचे नाव उत्साह !
२६५) स्वातंत्र्याचे मंदिर बलिदान करणाऱ्यांच्या रक्ताशिवाय उभे राहत नाही.
२६६) अन्याय आणि अत्याचार ह्याला सक्त विरोध हाच सत्याचा स्वभाव.
२६७) चारित्र्याचा विकास सुसंगतीत होतो तर बुध्दीचा विकास एकांतात होतो.
२६८) स्वधर्माविषयी प्रेम, परधर्माविषयी आदर आणि अधर्माविषयी उपेक्षा याचाच अर्थ धर्म.
२६९) अन्याय करणे हे पाप आणि होणारा अन्याय उघड्या डोळ्यांनी पाहणे हे महापाप !
२७०) क्रोध माणसाला पशू बनवतो.
२७१) आपल्या दोषांवरचे उपाय नेहमी आपल्याकडेच असतात; फक्त ते शोधण्याची तसदी घ्यावी लागते.
२७२) आयुष्यात पैसा हवा पण पैशात आयुष्य नको.
२७३) जे नंतर चांगले वाटते, तेच कृत्य नैतिक व जे नंतर दुःखकारक ठरते, ते अनैतिक !
२७४) कडू घोट प्रेमळ माणसाच्या हातून दिल्यास तो कमी कडू लागतो.
२७५) परमेश्वर ख्रऱ्या भावनेलाच साहाय्य करतो.
२७६) भरणाऱ्या जखमा भरू द्याव्यात; त्याची खपली काढू नये.
२७७) माणसाने माणसाशी माणसासारखं वागणं हाच खरा धर्म.
२७८) बोलावे की बोलू नये, असा संभ्रम निर्माण झाला असता मौनाने बोलण्याची जागा घ्यावी.
२७९) शत्रूने केलेले कौतुक हीच आपली सर्वोत्तम कीर्ती होय.
२८०) तिरस्कार पापाचा करा; पापी माणसाचा नको.
२८१) आयुष्य जगण्यासाठी नुसते विचार असुन चालत नाही; सुविचार असावे लागतात.
२८२) जरूरीपेक्षा अधिक गरजांचा हव्यास ठेवू नका.
२८३) आपलं जे असतं ते आपलं असतं आणि आपलं जे नसतं ते आपलं नसतं.
२८४) जो धोका पत्करण्यास कचरतो, तो लढाई काय जिंकणार !
२८५) लीनता आणि विनयशिलता या धार्मिकतेच्या दोन शाखाv v  आहेत.
२८६) ह्रदये परस्परांना द्यावीत, ती परस्परांच्या अधीन करू नयेत.
२८७) कर्तव्य पार न पाडता हक्कांच्या मागे धावलात तर ते दुर पळतात.
२८८) हाव सोडली की मोह संपतो आणि मोह संपाला की दुःख संपते.
२८९) आपण कसे दिसतो यापेक्षा कसे असतो याला अधिक महत्त्व आहे.
२९०) गरूडाइतके उडता येत नाही म्हणून चिमणी कधी उडण्याचे सोडत नाही.
२९१) आदर्श गृहिणी ही शेकडो गुरूंहून श्रेष्ठ आहे.
२९२) जो त्याग मनापासून केलेला नसतो, तो टिकत नसतो.
२९३) अहंकार विरहीत लहान सेवाही मोठीच असते.
२९४) तुम्हाला जर मित्र हवे असतील तर आधी तुम्ही दुसऱ्याचे मित्र बना .
२९५) न मागता देतो तोच खरा दानी.
२९६) चांगले काम करायचे मनात आले की ते लगेच करून टाका.
२९७) केवड्याला फळ येत नाही पण त्याच्या सुगंधाने तो अवघ्या जगाला मोहवून टाकतो.
२९८) समुद्रात कितीही मोठे वादळ आले तरी समुद्र आपली शांतता कधीही सोडत नाही
२९९) भितीयुक्त श्रीमंत जीवन जगण्यापेक्षा शांततामय, मानाचे गरीब जीवन चांगले.

३००) दुसऱ्याला सुख मिळत असेल तर आपण थोडे दुसहन करायला काय हरकत आहे

बुधवार, २० सप्टेंबर, २०१७

सुविचार

सुविचार
१) सुरुवात कशी झाली यावर बऱ्याच घटनांचा शेवट अवलंबून असतो.
२) आयुष्यात भावनेपेक्षा कर्तव्य मोठे असते.
३) प्रार्थना म्हणजे मनाचं स्थान
४) जग प्रेमाने जिंकता येतं; शत्रुत्वाने नाही.
५) यश मिळवायचं असेल तर स्वत:च स्वत:वर काही बंधन घाला.
६) प्रत्येकाच्या मनात एक आदर्श व्यक्ती असलीच पाहिजे.
७) ज्याने स्वत:चं मन जिंकलं त्याने जग जिंकलं.
८) यश मिळवण्यासाठी सगळ्यात मोठी शक्ती-आत्मविश्वास.
९) प्रतिकूलतेतही अनुकूलता निर्माण करतो तोच खरा माणूस !
१०) चुकतो तो माणूस आणि चुका सुधारतो तो देवमाणूस !
११) मित्र परिसासारखे असावेत म्हणजे आयुष्याचं सोनं होतं.
१२) छंद आपल्याला आयुष्यावर प्रेम करायला शिकवतात.
१३) आपण जे पेरतो तेच उगवतं.
१४) फ़ळाची अपेक्षा करुन सत्कर्म कधीच करु नये.
१५) उशीरा दिलेला न्याय हा न दिलेल्या न्यायासारखा असतो.
१६) शरीराला आकार देणारा कुंभार म्हणजे व्यायाम.
१७) प्रेम सर्वांवर करा पण श्रध्दा फ़क्त परमेश्वरावरच ठेवा.
१८) आधी विचार करा; मग कृती करा.
१९) आयुष्यत आई आणि वडील यांना कधीच विसरु नका,
२०) फ़क्त स्वत:साठी जगलास तर मेलास आणि स्वत:साठी जगून दुसऱ्यांसाठी जगलास तर जगलास !
२१) एकमेकांची प्रगती साधते ती खरी मैत्री.
२२) अतिथी देवो भव ॥
२३) अपयशाने खचू नका; अधिक जिद्दी व्हा.
२४) दु:ख कवटाळत बसू नका; ते विसरा आणि सदैव हसत रहा.
२५) आपल्यामुळे दुसऱ्याला दु:ख होईल असे कधीही वागू नका.








1) मित्र परिसासारखे असावेत म्हणजे आयुष्याचं सोनं होतं.
2) आयुष्यात भावनेपेक्षा कर्तव्य मोठे असते.
3) दु:ख कवटाळत बसू नका; ते विसरा आणि सदैव हसत रहा.
4) आयुष्यात काही करून दाखवायचे असेल तर आपण काय आहोत? यापेक्षा आपण काय होऊ शकतो
याचा विचार करायला हवा, जगात अशक्य काहीच नसतं.
5) मळलेल्या वाटा अधोगतीला कधीही नेत नाही, हे जितकं खरं तितकेच त्या प्रगतिचा
मार्ग दाखवीत नाही, हे ही खरं.
6) गंजण्यापेक्षा झिजणे केव्हाही चांगले !
यशाजवळ पोहोचण्यासाठी कधीही शॉर्टकट नसतो.
7) आयुष्यात नशीबाचा भाग फ़क्त एक टक्का आणि परिश्रमाचा भाग नव्याण्णव टक्के असतो.
8) आपण वाऱ्याची दिशा बदलू शकत नाही. परंतू. आपला पतंग मात्र निश्चितच नियंत्रित
करु शकतो.
9) तुम्ही आपल्या कर्माचा पडदा काचेसारखा स्वच्छ कराल तर त्यातून तुम्हाला
परमेश्वर दिसेल.
10) थोरांचे सदगुण घेणे हीच त्यांना वाहिलेली खरी श्रध्दांजली !
11) थोर काय अगर सामान्य काय ! प्रत्येकाला प्रत्येकाची गरज ही असतेच.
12) दुर्बल व्यक्ती एखादे उच्च ध्येय समोर ठेवून समाजात वावरु लागते तेव्हा धाडस व
साहस हे गुण तिच्यात आपोआप येतात.
13) दु:ख विभागल्याने कमी होते आणि सुख विभागल्याने वाढते.







जवळचे पैसे कधीतरी संपणारच; पण ते संपण्याआधी कमावण्याचे मार्ग शोधून ठेवावेत.

- नारायण मूर्ती
यश मिळविण्यासाठी कोणत्या मार्गाने जावे, हे मी सांगू शकणार नाही. पण स्वतःला ओळखून स्वतःला, स्वतःसाठी, स्वतःकडून नेमके काय हवे आहे; हे शोधणे म्हणजेच यशाच्या जवळ जाणे होय.

-- विश्‍वनाथन आनंद
नाही हा शब्द तुम्हाला ऐकू येत नाही, तोपर्यंत सगळे काही शक्‍य आहे.** *

-- धीरूभाई अंबानी
पैसा हा खतासारखा आहे. तो साचवला, की कुजत जातो आणि गुंतवला तर वाढायला मदत करतो. *

-- जे. आर. डी. टाटा
फोटोग्राफरच्या एका "क्‍लिक'मुळे जगणे चिरकाल होते.** *

-- रघू राय
चुका दाखविताना त्या कमी कशा करायच्या हे ही सांगितले, तर त्याचा परिणाम चांगला होतो.*

- बिल गेट्‌स
मी विशिष्ट प्रदेशाचा, देशाचा ही भावना गळून पडण्यासाठी ताऱ्यांकडे बघा; कारण तेव्हा तुम्ही एका अवकाशाचे झालेला असता. *

- कल्पना चावला
कुणीतरी येऊन बदल घडवतील, याची वाट बघत बसण्यापेक्षा स्वतःच होणाऱ्या बदलाचा भाग व्हा.*

-- बराक ओबामा
माझ्याकडून काही महत्त्वाचे शोध लागले. याचा अर्थ मी कुणी वेगळा, हुशार आहे असा होत नाही. तर वाट पाहण्याची, प्रयत्न करण्याची तयारी माझ्यात इतरांपेक्षा जरा जास्त होती इतकेच.

-- आयझॅक न्यूटन
मानवाचा दानव होणे ही त्याची हार; मानवाचा महामानव होणे, हा त्याचा चमत्कार आणि मानवाचा "माणूस' होणे; हे त्याचे यश आहे.

-- सर्वपल्ली राधाकृष्णन*








नक्की वाचा मस्त आहे..
एकदा एका जोकर ने लोकांना खूप छान जोक सांगितला लोक खूप हसले...
परत त्याने दुसर्यांदा तोच जोक सांगितला लोककमी हसले....
परत तिसर्यांना त्याने तोच जोक सांगितला , काहीच लोक हसले ..
त्याने वारंवार तोच जोक सांगितला , लोक हसेनासे झाले...
आता त्याने एक महत्वाची गोष्ट लोकांना सांगितली कि,
"जर एखाद्या आनंदावर तुम्ही वारंवार आनंदी होऊ शकत नाही तर..
एखाद्या दुखावर तुम्ही वारंवार दुःखी कसे काय होऊ शकतात"

मंगळवार, १९ सप्टेंबर, २०१७

डॉक्टर आंबेडकर यांचे विचार

समता, स्वातंत्र्य, विश्वबंधुत्व या तीन तत्वावर आधारित जीवनमार्ग म्हणजे लोकशाही.
*  समता, स्वातंत्र्य, सहानुभूती यानेच व्यक्ती विकास होतो.
*  जो तो परिश्रम व कर्तुत्व यांच्या जोरावर महत्पदाला चढतो.
*  माणसाला आपल्या दारिद्र्याची लाज वाटता कामा नये. लाज वाटायला पाहिजे ती दुर्गुणांची.
*  शील, करुणा, विद्या,मैत्री, प्रज्ञा या पंचतत्वावर प्रत्येक विद्यार्थ्याने आपले चरित्र बनविले पाहिजे.
*  मोठ्या गोष्टीचे बेत करण्यापेक्षा छोट्या गोष्टीने आरंभ करणे अधीक श्रेयस्कर ठरते.
*  माणूस धर्माकरीता नाही, धर्म माणसाकरिता आहे.
*  शिका ! संघटीत व्हा ! संघर्ष करा !
*  जेथे एकता तेथेच सुरक्षितता.
*  काम लवकर करावयाचे असेल तर मुहूर्त पाहण्यात वेळ घालवू नका.
*  सेवा जवळून, आदर दुरून, ज्ञान आतून असावे.
*  जो प्रतीकुल  लोकमताला घाबरून जात नाही, दुसऱ्यांचे हातचे बाहुले न होण्या ईतकी बुद्धी ठेवतात,
स्वाभिमान ज्याला आहे तोच माणूस स्वतंत्र्य आहे असे मी समजतो,
*  शिक्षण हे वाघिणीचे दुध आहे.
*  जे खरे आहे तेच बोलावे.
*  माणसाने खावे जगण्यासाठी, पण जगावे समाजासाठी.
*  दुसर्याच्या सुख-दु:खात भागीदार व्हावयास शिकणे हेच खरे शिक्षण आहे.
*  शाळा हे सभ्य नागरिक तयार करण्याचे पवित्र  क्षेत्र आहे.